प्रमुख हिंदू त्योहार • वर्ष २०२७

अहोई अष्टमी व्रत 2027: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा एवं संपूर्ण शास्त्रीय विधान

अहोई अष्टमी का व्रत संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए माताएं रखती हैं। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है, जिसमें स्याहु माता और अहोई देवी की पूजा का विशेष विधान है।

२० अक्टूबर २०२७, बुधवार तिथि व दिनांक
प्रमुख हिंदू त्योहार धार्मिक श्रेणी
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३ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: अहोई अष्टमी का व्रत संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए माताएं रखती हैं। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है, जिसमें स्याहु माता और अहोई देवी की पूजा का विशेष विधान है।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी
प्रारंभ / मुख्य तिथि: २० अक्टूबर २०२७, बुधवार
शुभ मुहूर्त / समय: शाम 05:45 से 07:15 बजे तक
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ अहोई देव्यै नमः। अहोई मातायै नमः।

संतान के कल्याण का महापर्व

हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए किया जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व 'स्याहु माता' के पूजन के रूप में भी प्रसिद्ध है। स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, जो माताएं इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखती हैं, उनकी संतान पर आने वाले समस्त संकट टल जाते हैं।

पंचांग एवं शुभ मुहूर्त (2027)

विवरणसमय/तिथि
अष्टमी तिथि प्रारंभ20 अक्टूबर 2027, प्रातः 08:15 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त21 अक्टूबर 2027, प्रातः 06:45 बजे
पूजा का शुभ मुहूर्तशाम 05:45 से 07:15 बजे तक
तारों को देखने का समयसंध्याकाल 06:30 बजे

पूजा विधि एवं संकल्प

अहोई अष्टमी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात व्रत का संकल्प लें: 'मम पुत्रस्य दीर्घायुष्यं, आरोग्यं, ऐश्वर्यं च प्राप्त्यर्थं अहोई अष्टमी व्रतमहं करिष्ये।' दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाएं, जिसमें स्याहु और उसके बच्चों का भी अंकन हो।

पूजन सामग्री

  • अहोई माता का चित्र या कैलेंडर
  • दूध का कलश
  • चावल, रोली, अक्षत, धूप, दीप
  • मिठाई (हलवा-पूरी)
  • श्रृंगार का सामान
  • अर्घ्य के लिए जल से भरा पात्र

व्रत कथा (पौराणिक संदर्भ)

प्राचीन काल में एक साहूकार के सात पुत्र थे। दीपावली से पूर्व अष्टमी के दिन साहूकार की पत्नी जंगल में मिट्टी लेने गई। वहां उसने अनजाने में एक स्याहु (सेही) के बच्चे को मार दिया। इसके श्राप से उसके सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई। दुखी होकर उसने एक बुढ़िया को अपनी व्यथा सुनाई। बुढ़िया ने उसे अहोई माता की शरण में जाने को कहा। उसने विधि-विधान से व्रत किया और माता की कृपा से उसके सातों पुत्र पुनर्जीवित हो गए।

नियम एवं सावधानियां

व्रत निर्जला रखा जाता है। तारों को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन ग्रहण करें। तामसिक भोजन का त्याग करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

निष्कर्ष

अहोई अष्टमी का व्रत केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि मातृशक्ति का अपने बच्चों के प्रति अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। यह व्रत संतान के जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आध्यात्मिक कवच है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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