प्रमुख हिंदू त्योहार • वर्ष २०२७

अक्षय तृतीया 2027: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं अक्षय पुण्यदायी व्रत कथा

अक्षय तृतीया, जिसे 'आखा तीज' के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में सबसे शुभ और फलदायी तिथियों में से एक है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आने वाला यह पर्व स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है, जिसमें किए गए दान, जप, तप और पूजा का फल अक्षय (कभी नष्ट न होने वाला) होता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है।

१० मई २०२७, सोमवार तिथि व दिनांक
प्रमुख हिंदू त्योहार धार्मिक श्रेणी
२९ कुल पाठक संख्या
३ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: अक्षय तृतीया, जिसे 'आखा तीज' के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में सबसे शुभ और फलदायी तिथियों में से एक है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आने वाला यह पर्व स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है, जिसमें किए गए दान, जप, तप और पूजा का फल अक्षय (कभी नष्ट न होने वाला) होता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया
प्रारंभ / मुख्य तिथि: १० मई २०२७, सोमवार
शुभ मुहूर्त / समय: प्रातः 05:12 से अगले दिन 07:30 बजे तक (पूरा दिन शुभ)
समाप्ति / पारण तिथि: ११ मई २०२७, मंगलवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

आध्यात्मिक महत्व एवं शास्त्रीय विवेचन

अक्षय तृतीया का दिन हिंदू पंचांग में अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है। 'अक्षय' का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो। स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, दान, या पूजा अनंत गुना फल प्रदान करती है। यह दिन सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ बिंदु माना जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु के नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम अवतार का प्राकट्य हुआ था।

पंचांग एवं शुभ मुहूर्त (2027)

विवरणसमय/विवरण
तिथिवैशाख शुक्ल तृतीया
तृतीया तिथि प्रारंभ10 मई 2027, प्रातः 05:12 बजे
तृतीया तिथि समाप्त11 मई 2027, प्रातः 07:30 बजे
अभिजित मुहूर्त11:50 से 12:45 बजे तक
पूजा का श्रेष्ठ समयसूर्योदय से मध्याह्न तक

पूजा विधि एवं संकल्प

अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु की पूजा 'शोडशोपचार' विधि से की जाती है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के समक्ष संकल्प लें: 'मम अखिल पाप क्षयपूर्वकं सकल मनोकामना सिद्धयर्थं श्रिया सहितं विष्णु पूजनं करिष्ये।'

पूजा में तुलसी दल, केसर, चंदन, पीले पुष्प और नैवेद्य में जौ का सत्तू या मिष्ठान अर्पित करें। भगवान को पंचामृत से अभिषेक कराएं और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जप करें।

अक्षय तृतीया व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक गरीब व्यक्ति था जो सदैव धर्म-कर्म में विश्वास रखता था। उसने अक्षय तृतीया के दिन गंगा स्नान कर विधि-विधान से दान-पुण्य किया। इस व्रत के प्रभाव से अगले जन्म में वह राजा बना और उसे अक्षय धन-संपदा की प्राप्ति हुई। यह कथा हमें सिखाती है कि श्रद्धापूर्वक किया गया छोटा सा दान भी अक्षय फल देता है।

सांस्कृतिक परंपराएं

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। राजस्थान में इसे 'आखा तीज' कहते हैं और इस दिन पुतली विवाह की परंपरा है। बंगाल में इसे 'हलखल' के रूप में व्यापारी नए बही-खाते शुरू करते हैं। दक्षिण भारत में इस दिन विशेष रूप से स्वर्ण आभूषण खरीदने की परंपरा है, जिसे लक्ष्मी का आगमन माना जाता है।

नियम एवं सावधानियां

  • इस दिन तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करें।
  • क्रोध, ईर्ष्या और असत्य से दूर रहें।
  • दान में जौ, सत्तू, जल, पंखा और वस्त्र का विशेष महत्व है।
  • स्वर्ण खरीदना शुभ माना जाता है, परंतु दान करना उससे भी अधिक पुण्यकारी है।

मंत्र

ध्यान मंत्र: ॐ ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्ती नारायणः सरसिजासन सन्निविष्टः।
मूल मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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