सौभाग्य महापर्व • वर्ष २०२७

हरतालिका तीज व्रत 2027: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं संपूर्ण व्रत कथा

हरतालिका तीज अखंड सौभाग्य का महापर्व है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव के प्रति उनके अटूट प्रेम को समर्पित है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।

६ सितंबर २०२७, सोमवार तिथि व दिनांक
सौभाग्य महापर्व धार्मिक श्रेणी
१ कुल पाठक संख्या
१२ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: हरतालिका तीज अखंड सौभाग्य का महापर्व है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव के प्रति उनके अटूट प्रेम को समर्पित है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया
प्रारंभ / मुख्य तिथि: ६ सितंबर २०२७, सोमवार
शुभ मुहूर्त / समय: प्रदोष काल: 18:45 से 20:50 बजे तक
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः

हरतालिका तीज 2027: अखंड सौभाग्य का दिव्य महापर्व

हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष महत्व है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। 'हरतालिका' शब्द 'हरत' (अपहरण) और 'आलिका' (सखी) से बना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती की सखियों ने उन्हें पिता के घर से हरण कर लिया था ताकि वे भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर सकें।

शास्त्रीय आधार एवं आध्यात्मिक महत्व

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, यह व्रत सौभाग्य की प्राप्ति का सबसे श्रेष्ठ साधन है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा करने से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और पति की आयु में वृद्धि होती है। कुंवारी कन्याएं यदि यह व्रत विधि-विधान से करें, तो उन्हें मनवांछित वर की प्राप्ति होती है।

पंचांग एवं शुभ मुहूर्त 2027

विवरणसमय/तिथि
तृतीया तिथि प्रारंभ06 सितंबर 2027, प्रातः 08:20 बजे
तृतीया तिथि समाप्त07 सितंबर 2027, प्रातः 06:10 बजे
प्रातःकालीन पूजा मुहूर्त06:05 से 08:30 बजे
प्रदोष काल पूजा18:45 से 20:50 बजे

पूजा विधि एवं संकल्प

प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद संकल्प लें: 'मम सुख सौभाग्य पुत्र-पौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये हरतालिका व्रतमहं करिष्ये।' पूजा स्थल पर रेत या मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाएं।

आवश्यक पूजा सामग्री

गीली मिट्टी, बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, आक के फूल, गाय का दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, सुहाग सामग्री (बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, सिंदूर) और नए वस्त्र।

पौराणिक व्रत कथा

माता पार्वती ने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए हिमालय पर कठोर तप किया। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया। नारद मुनि के कहने पर पिता ने उनका विवाह विष्णु जी से तय कर दिया, लेकिन पार्वती जी ने सखियों से कहा कि वे केवल शिव को ही वरेंगी। सखियों ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया जहाँ उन्होंने रेत के शिवलिंग बनाकर पूजा की। अंततः शिव जी प्रसन्न हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

व्रत के नियम एवं सावधानियां

यह व्रत निर्जला रखा जाता है। अगले दिन सूर्योदय के बाद ही पारण करना चाहिए। व्रत के दौरान क्रोध, असत्य और कलह से दूर रहना चाहिए। रात्रि जागरण का इस व्रत में विशेष महत्व है।

निष्कर्ष

हरतालिका तीज केवल एक व्रत नहीं, बल्कि समर्पण और प्रेम का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि निष्ठा और तपस्या से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

हरतालिका तीज 2027: आध्यात्मिक महत्व और व्रत का स्वरूप

सनातन धर्म में हरतालिका तीज का व्रत अत्यंत कठिन और फलदायी माना गया है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए समर्पित है। वर्ष 2027 में यह व्रत महिलाओं के लिए विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा लेकर आ रहा है। इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन का स्मरण किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिसे 'हरतालिका' कहा जाता है। 'हरत' का अर्थ है हरण करना और 'आलिका' का अर्थ है सखी। कथा के अनुसार, सखियों द्वारा माता पार्वती को पिता के घर से हरण कर वन में ले जाने के कारण ही इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा।

यह व्रत केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आत्म-संयम और अटूट विश्वास की परीक्षा है। निर्जला रहकर किया जाने वाला यह व्रत शरीर की शुद्धि के साथ-साथ मन की एकाग्रता को भी बढ़ाता है। 2027 में इस व्रत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह ग्रहों की विशेष स्थिति में पड़ रहा है, जो दांपत्य जीवन में मधुरता और स्थिरता लाने के लिए अत्यंत शुभ है। जो महिलाएं इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ करती हैं, उन्हें न केवल सौभाग्य की प्राप्ति होती है, बल्कि उनके परिवार में सुख, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।

हरतालिका तीज का व्रत 'निराजल' (बिना जल के) किया जाता है, जो इसे अन्य व्रतों से भिन्न बनाता है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और भगवान शिव-पार्वती की बालू या मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा करती हैं। यह व्रत स्त्री शक्ति के उस स्वरूप को दर्शाता है जो अपने संकल्प के बल पर ब्रह्मांड की ऊर्जा को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। 2027 में इस व्रत के दौरान ग्रहों की अनुकूलता उन महिलाओं के लिए विशेष वरदान सिद्ध होगी जो अपने वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार की बाधाओं का सामना कर रही हैं।

हरतालिका तीज 2027: शुभ मुहूर्त और पंचांग गणना

वर्ष 2027 में हरतालिका तीज का व्रत 7 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि का प्रारंभ 6 सितंबर की मध्यरात्रि के पश्चात होगा और इसका समापन 7 सितंबर की रात्रि में होगा। पूजा के लिए सबसे उत्तम समय प्रदोष काल माना जाता है। प्रदोष काल वह समय है जब दिन और रात का मिलन होता है, और इस समय की गई पूजा सीधे भगवान शिव तक पहुँचती है।

विवरण समय/तिथि
हरतालिका तीज तिथि 7 सितंबर 2027, मंगलवार
तृतीया तिथि प्रारंभ 6 सितंबर 2027, रात्रि 02:45 बजे से
तृतीया तिथि समापन 7 सितंबर 2027, रात्रि 23:50 बजे तक
प्रातःकालीन पूजा मुहूर्त 06:05 से 08:35 तक
प्रदोष काल पूजा मुहूर्त 18:40 से 20:55 तक

पूजा के लिए प्रदोष काल का समय सबसे महत्वपूर्ण है। शास्त्रों में कहा गया है कि सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त 'प्रदोष' कहलाते हैं। 2027 में इस समय भगवान शिव की आराधना करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी। व्रती महिलाओं को चाहिए कि वे इस समय के दौरान पूर्ण एकाग्रता के साथ शिव-पार्वती का ध्यान करें। इस वर्ष का शुभ मुहूर्त उन महिलाओं के लिए अत्यंत फलदायी है जो संतान प्राप्ति या परिवार की उन्नति के लिए संकल्पित हैं।

विस्तृत पूजा विधि एवं अनुष्ठान प्रक्रिया

हरतालिका तीज की पूजा विधि अत्यंत पवित्र और व्यवस्थित है। सबसे पहले, एक स्वच्छ स्थान पर मंडप तैयार करें और उसे केले के पत्तों और फूलों से सजाएं। भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित करें। यदि मिट्टी की प्रतिमा उपलब्ध न हो, तो आप शिव-पार्वती के चित्र का भी पूजन कर सकते हैं। पूजा की शुरुआत भगवान गणेश के आह्वान से करें, क्योंकि किसी भी शुभ कार्य में प्रथम पूज्य गणेश जी का स्मरण अनिवार्य है।

पूजा के दौरान 'षोडशोपचार' विधि का पालन करना चाहिए। इसमें भगवान को चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। माता पार्वती को 'सौभाग्य सामग्री' (बिंदी, चूड़ी, सिंदूर, मेहंदी, महावर) अर्पित करना अनिवार्य है। यह सामग्री माता को अत्यंत प्रिय है और इसे अर्पित करने से सौभाग्य में वृद्धि होती है। इसके बाद, हरतालिका तीज की व्रत कथा का पाठ करें। कथा सुनते समय मन में पूर्ण श्रद्धा रखें और अंत में शिव-पार्वती की आरती करें।

विशेष निर्देश: पूजा के दौरान 'ॐ उमामहेश्वराय नमः' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। यह मंत्र दांपत्य जीवन के क्लेश को दूर करने और आपसी प्रेम को प्रगाढ़ बनाने में सक्षम है।

पूजा के अगले दिन, सूर्योदय के पश्चात स्नान करके और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें। पारण में सात्विक भोजन का ही प्रयोग करें। इस व्रत में नमक का सेवन वर्जित माना गया है, इसलिए पारण के समय भी सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रत का समापन करते समय माता पार्वती से अपने पति की दीर्घायु और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।

हरतालिका तीज की पौराणिक कथा और उसका दार्शनिक अर्थ

पौराणिक कथा के अनुसार, हिमालय राज की पुत्री पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या का मार्ग चुना। उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया और केवल सूखे पत्तों का सेवन किया, जिसे 'अपर्णा' तपस्या कहा गया। नारद मुनि के कहने पर पिता हिमालय ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया, लेकिन पार्वती जी ने इसे स्वीकार नहीं किया। अपनी सखियों की सहायता से वे वन में चली गईं और वहां रेत से शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा की।

उनकी इस अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा पूर्ण की। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम और समर्पण किसी भी बाधा को पार कर सकता है। हरतालिका तीज का व्रत केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस 'तप' का प्रतीक है जो एक स्त्री अपने परिवार की रक्षा के लिए करती है। यह व्रत हमें सिखाता है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना धैर्य और ईश्वर पर विश्वास के साथ करना चाहिए।

दार्शनिक दृष्टि से, यह व्रत 'माया' (संसार) से 'शिव' (परमात्मा) की ओर जाने का मार्ग है। रेत के शिवलिंग का निर्माण यह दर्शाता है कि यह संसार नश्वर है, लेकिन ईश्वर की भक्ति शाश्वत है। 2027 में इस कथा का श्रवण और मनन करने से मन में व्याप्त नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्रत महिलाओं को मानसिक शक्ति प्रदान करता है ताकि वे अपने परिवार को एक सूत्र में बांधकर रख सकें।

व्रत के नियम और सावधानियां

  • निर्जला व्रत: इस व्रत में जल का त्याग करना अनिवार्य है, हालांकि स्वास्थ्य कारणों से गर्भवती महिलाएं या बीमार व्यक्ति फल या दूध का सेवन कर सकते हैं।
  • जागरण: तीज की रात को जागकर भजन-कीर्तन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे 'रात्रि जागरण' कहते हैं, जो शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त करने का उत्तम साधन है।
  • सात्विकता: व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म से सात्विक रहें। किसी के प्रति क्रोध या ईर्ष्या का भाव न रखें।
  • दान का महत्व: व्रत के अगले दिन सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

अंत में, हरतालिका तीज 2027 का यह व्रत आपके जीवन में नई उमंग और खुशहाली लेकर आए। इस दिन का उपयोग केवल पूजा तक सीमित न रखें, बल्कि अपने भीतर के आध्यात्मिक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करें। भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद आप सभी पर सदैव बना रहे।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

अन्य महत्वपूर्ण सनातन त्यौहार व व्रत

🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!