व्रत व उपवास • वर्ष २०२६

संकष्टी चतुर्थी (अंगारकी चतुर्थी) व्रत 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं व्रत कथा

संकष्टी चतुर्थी (विशेष रूप से अंगारकी चतुर्थी) भगवान श्रीगणेश को समर्पित अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। इस पावन व्रत के विधि-विधान, शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय समय, पूजा सामग्री, और पौराणिक कथा के साथ संपूर्ण मार्गदर्शिका पढ़ें।

५ मार्च २०२६, गुरुवार तिथि व दिनांक
व्रत व उपवास धार्मिक श्रेणी
२६ कुल पाठक संख्या
८ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: संकष्टी चतुर्थी (विशेष रूप से अंगारकी चतुर्थी) भगवान श्रीगणेश को समर्पित अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। इस पावन व्रत के विधि-विधान, शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय समय, पूजा सामग्री, और पौराणिक कथा के साथ संपूर्ण मार्गदर्शिका पढ़ें।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि
प्रारंभ / मुख्य तिथि: ५ मार्च २०२६, गुरुवार
शुभ मुहूर्त / समय: संध्या पूजा: सायं 06:15 से 07:45 बजे तक / चंद्रोदय रात्रि 08:35 बजे के पश्चात
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ वक्रतुण्डाय हुं फट्‍ नमः | ॐ गं गणपतये नमः

संकष्टी चतुर्थी (अंगारकी चतुर्थी) 2026: आध्यात्मिक परिचय एवं महत्व

हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान श्री गणेश जी की उपासना के लिए समर्पित होती है। इसमें भी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को 'संकष्टी चतुर्थी' (Sankashti Chaturthi) कहा जाता है, जिसका अर्थ है सभी संकटों को हरने वाली चतुर्थी। जब यह संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तब इसे 'अंगारकी संकष्टी चतुर्थी' (Angarki Chaturthi) के रूप में मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र और पुराणों के अनुसार, अंगारकी चतुर्थी का महत्व सामान्य संकष्टी चतुर्थी की तुलना में कई गुना अधिक माना गया है, क्योंकि मंगलवार के दिन का कारक मंगल ग्रह (अंगारक) और विघ्नहर्ता भगवान गणेश का सीधा संबंध है।

स्कन्द पुराण, पद्म पुराण और नारद पुराण में संकष्टी चतुर्थी व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। भगवती महापुराण के अनुसार, जो भक्त सच्चे मन से विधि-विधान पूर्वक संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखता है, उसके जीवन के समस्त विघ्न, बाधाएं, कर्ज, ग्रह दोष और दारिद्र्य का नाश होता है। भगवान गणेश जी को 'प्रथम पूज्य' कहा जाता है; अतः किसी भी शुभ कार्य, अनुष्ठान या पूजा से पहले इनका स्मरण किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात ही व्रत पूर्ण माना जाता है। चंद्र दर्शन के बिना यह व्रत अधूरा रहता है।

संकष्टी चतुर्थी 2026: पंचांग, तिथि एवं शुभ मुहूर्त

व्रत एवं पर्व की पूर्ण सफलता के लिए सटीक पंचांग और मुहूर्त का ज्ञान होना अनिवार्य है। आइए संकष्टी चतुर्थी के विस्तृत पंचांग स्वरूप को समझें:

पंचांग अंग विवरण
मास एवं पक्ष कृष्ण पक्ष, संकष्टी चतुर्थी तिथि
चतुर्थी तिथि प्रारंभ पंचांगीय गणना के अनुसार निर्धारित तिथि समय
चतुर्थी तिथि समाप्त अगले दिन प्रातःकाल तक
ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 04:20 बजे से 05:08 बजे तक
अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:45 बजे से 12:32 बजे तक
संध्या पूजा मुहूर्त (प्रदोष काल) सायं 06:15 बजे से 07:45 बजे तक
चन्द्रोदय समय रात्रि 08:35 बजे से 09:15 बजे के मध्य (स्थान अनुसार भिन्न)

संकष्टी चतुर्थी पूजन सामग्री सूची

भगवान गणेश के पूजन के लिए शास्त्रों में निर्धारित पवित्र सामग्री का होना आवश्यक है। नीचे दी गई सूची के अनुसार अपनी पूजन सामग्री एकत्र करें:

  • चौकी के लिए लाल या पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र।
  • भगवान गणेश की सुप्रसिद्ध प्रतिमा या चित्र (सिंदूरी रंग की प्रतिमा सर्वोत्तम)।
  • गणेश जी को अर्पित करने के लिए दूर्वा घास (दूर्वांकुर - 21 गांठों का जोड़ा)।
  • शुद्ध देसी घी का दीपक, कपूर, अगरबत्ती, धूप।
  • रोली, अक्षत (अखंड चावल), कलावा (रक्षा सूत्र), जनेऊ।
  • मोदक या बेसन के लड्डू (गणेश जी का प्रिय भोग)।
  • ऋतुफल (केला, सेब, अनार आदि) और पान, सुपारी, इलायची, लौंग।
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण) अभिषेक के लिए।
  • अर्घ्य देने के लिए तांबे या पीतल का लोटा, जिसमें जल, कच्चा दूध, अक्षत और लाल फूल हो।

चरण-बद्धा पूजा विधि एवं संकल्प विधान

संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रती को निम्नलिखित शास्त्रीय विधि से पूजा संपन्न करनी चाहिए:

  1. प्रातःकालीन स्नान एवं संकल्प: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात मन में भगवान गणेश का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें— "मम सर्वविघ्नशान्तये सर्वसिद्धिप्रदये संकष्टीचतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।"
  2. चौकी स्थापना: घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूजा घर में एक साफ चौकी रखें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
  3. षोडशोपचार पूजा: सबसे पहले गणेश जी का आचमन कराएं। उन्हें रोली, अक्षत, सिंदूर, और जनेऊ अर्पित करें। इसके बाद अत्यंत प्रिय 'दूर्वा' अर्पित करें।
  4. मंत्रोच्चार एवं भोग: धूप-दीप जलाकर 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। भगवान को मोदक, फल और नैवेद्य का भोग लगाएं।
  5. संध્યાकालीन चंद्रोदय पूजन: दिनभर निराहार या फलाहार रहकर व्रत करें। संध्याकाल में पुनः गणेश जी की आरती करें। रात्रि में जब चंद्रोदय हो, तब चंद्रमा को दूध और जल से अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण करें।

पवित्र वैदिक एवं पौराणिक मंत्र

पूजा के दौरान इन मंत्रों का उच्चारण करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है:

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

अर्थात: हे घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ सूर्यों के समान कांतिवान भगवान गणेश! मेरे सभी कार्य हमेशा विघ्नमुक्त हों।

ॐ गं गणपतये नमः॥

अर्थात: समस्त विघ्नों के हर्ता भगवान गणेश को मेरा बारंबार प्रणाम है।

संकष्टी चतुर्थी पौराणिक व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सत्ययुग में संकटों से घिरे देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली। देवताओं ने कहा कि उनके जीवन में दैत्यों का प्रकोप और तमाम परेशानियां बढ़ गई हैं। तब भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों— कार्तिकेय और गणेश जी की ओर देखा और पूछा कि इनमें से कौन देवताओं के संकट का निवारण करेगा। तब श्री गणेश जी ने आगे आकर कहा कि वे देवताओं के सभी संकटों का नाश करेंगे। उसी समय से चतुर्थी के दिन गणेश जी की उपासना का विधान आरंभ हुआ।

एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि हे भगवन्! माघ मास के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी का क्या नाम है और इसकी कथा क्या है? तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर महाराज को संकष्टी चतुर्थी व्रत का महात्म्य बताते हुए राजा हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़ी एक कथा सुनाई। कथा के अनुसार, एक नगर में एक गरीब ब्राह्मण रहता था जिसके पास आजीविका का कोई साधन नहीं था। उसकी एक धर्मपरायण पत्नी थी। उस ब्राह्मण ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत विधि-विधान से किया, जिसके प्रभाव से उसके घर में माता लक्ष्मी का आगमन हुआ और उसके सभी कष्ट दूर हो गए। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को धन, धान्य, ऐश्वर्य, बुद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

नियम, खानपान, और क्या करें-क्या न करें (Dos & Don'ts)

व्रत की पवित्रता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  • क्या करें: प्रातःकाल जल्दी उठें, सात्विक भोजन या फलाहार लें, जरूरतमंदों को दान दें, और गाय को हरा चारा या गुड़-रोटी खिलाएं।
  • क्या न करें: तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा) का सेवन बिल्कुल न करें। क्रोध, ईर्ष्या, और असत्य वचनों से दूर रहें।
  • व्रत पारण नियम: चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात ही जल ग्रहण करें और सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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