प्रमुख हिंदू त्योहार • वर्ष २०२७

शरद पूर्णिमा 2027: कोजागरी व्रत, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं रास पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व

शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत की वर्षा करता है। भक्तिकाल के इस विशेष लेख में जानें शरद पूर्णिमा 2027 की सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त, लक्ष्मी पूजन विधि, अमृत खीर का महत्व और पौराणिक कथा।

१६ अक्टूबर २०२७, शनिवार तिथि व दिनांक
प्रमुख हिंदू त्योहार धार्मिक श्रेणी
३७ कुल पाठक संख्या
३ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत की वर्षा करता है। भक्तिकाल के इस विशेष लेख में जानें शरद पूर्णिमा 2027 की सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त, लक्ष्मी पूजन विधि, अमृत खीर का महत्व और पौराणिक कथा।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: आश्विन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा
प्रारंभ / मुख्य तिथि: १६ अक्टूबर २०२७, शनिवार
शुभ मुहूर्त / समय: चंद्रोदय समय: 17 अक्टूबर 2027, सायं 05:45 बजे
समाप्ति / पारण तिथि: १७ अक्टूबर २०२७, रविवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः

आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

शरद पूर्णिमा, जिसे 'कोजागरी पूर्णिमा' या 'रास पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अमृत की वर्षा करता है। स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है।

पंचांग एवं शुभ मुहूर्त (2027)

विवरणसमय/तिथि
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ16 अक्टूबर 2027, सायं 04:30 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त17 अक्टूबर 2027, सायं 06:15 बजे
चंद्रोदय समय17 अक्टूबर 2027, सायं 05:45 बजे
अभिजित मुहूर्त11:45 से 12:35

पूजा विधि एवं संकल्प

शरद पूर्णिमा के दिन माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। 'मम क्षेमस्थैर्यविजयायुరारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये कोजागरीव्रतमहं करिष्ये' मंत्र का उच्चारण करें। शाम को चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य दें और गाय के दूध की खीर बनाकर उसे चांदनी में रखें।

पौराणिक कथा: कोजागरी व्रत

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक गरीब ब्राह्मण की दो पुत्रियाँ थीं। वे दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। छोटी पुत्री ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया, जिससे प्रसन्न होकर माँ लक्ष्मी ने उसे धन-धान्य से परिपूर्ण कर दिया। 'कोजागरी' का अर्थ है 'कौन जाग रहा है?' (को जागर्ति)। मान्यता है कि इस रात माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जो भक्त जागकर उनकी आराधना करते हैं, उन्हें वे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

रास पूर्णिमा का रहस्य

ब्रज में इसे 'रास पूर्णिमा' कहा जाता है। मान्यता है कि इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। यह आत्मा का परमात्मा से मिलन का प्रतीक है। इस दिन चंद्रमा की किरणों में औषधीय गुण होते हैं, इसलिए खीर को रात भर चांदनी में रखने का विधान है।

नियम एवं सावधानियां

व्रत के दौरान सात्विक भोजन करें। तामसिक पदार्थों का त्याग करें। खीर को मिट्टी के पात्र में रखें और उसे स्वच्छ स्थान पर रखें। अगले दिन सूर्योदय के बाद ही व्रत का पारण करें।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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