एकादशी व्रत • वर्ष २०२७

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत 2027: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं संपूर्ण व्रत कथा

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी संतान प्राप्ति और उनके कल्याण के लिए अत्यंत फलदायी मानी गई है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने हेतु यह व्रत मोक्ष और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

१५ अगस्त २०२७, रविवार तिथि व दिनांक
एकादशी व्रत धार्मिक श्रेणी
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१२ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी संतान प्राप्ति और उनके कल्याण के लिए अत्यंत फलदायी मानी गई है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने हेतु यह व्रत मोक्ष और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: श्रावण शुक्ल पक्ष एकादशी
प्रारंभ / मुख्य तिथि: १५ अगस्त २०२७, रविवार
शुभ मुहूर्त / समय: 16 अगस्त 2027, प्रातः 06:05 से 08:30 बजे तक (पारण)
समाप्ति / पारण तिथि: १६ अगस्त २०२७, सोमवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027: आध्यात्मिक महत्व एवं शास्त्रीय विवेचन

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। वर्ष की चौबीस एकादशियों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'पुत्रदा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह व्रत विशेष रूप से उन दंपत्तियों के लिए अत्यंत मंगलकारी है जो संतान सुख से वंचित हैं या जिनकी संतानें किसी कष्ट से गुजर रही हैं। पद्म पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु के 'नारायण' स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पंचांग एवं शुभ मुहूर्त (2027)

विवरणसमय/तिथि
एकादशी तिथि प्रारंभ15 अगस्त 2027, प्रातः 09:12 बजे
एकादशी तिथि समाप्त16 अगस्त 2027, प्रातः 07:45 बजे
पारण का समय17 अगस्त 2027, प्रातः 06:05 से 08:30 बजे तक
अभिजित मुहूर्त11:58 से 12:48 बजे तक

पूजन सामग्री

पूजा के लिए शुद्ध आसन, गंगाजल, भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र, तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य (फल, पंचामृत, मिश्री), और दक्षिणा की आवश्यकता होती है।

विधि-विधान एवं संकल्प

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपने पूजा स्थल को शुद्ध करें और भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें: 'मम पुत्र-पौत्रादि सकल कल्याणार्थं पुत्रदा एकादशी व्रतम् अहं करिष्ये।' इसके पश्चात भगवान का षोडशोपचार पूजन करें। उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं, पीले वस्त्र अर्पित करें और तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं।

पौराणिक व्रत कथा

प्राचीन काल में महिष्मती पुरी में राजा महीजित राज्य करते थे। राजा के पास सब कुछ था, परंतु संतान न होने के कारण वे सदैव दुखी रहते थे। उन्होंने ऋषियों की शरण ली। लोमश ऋषि ने उन्हें श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत करने का सुझाव दिया। राजा ने विधि-विधान से व्रत किया, जिसके प्रभाव से उन्हें तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। तब से यह व्रत 'पुत्रदा एकादशी' के नाम से विख्यात हुआ।

नियम एवं सावधानियां

व्रत के दिन तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित है। द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान देकर ही व्रत का पारण करें।

निष्कर्ष

श्रावण पुत्रदा एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का पर्व है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत जीवन में सुख, शांति और वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करता है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027: आध्यात्मिक महत्व और काल गणना

सनातन धर्म में एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'पुत्रदा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2027 में यह पावन तिथि अत्यंत शुभ योगों के साथ आ रही है। शास्त्रों के अनुसार, श्रावण मास भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की आराधना के लिए सर्वोत्तम है। पुत्रदा एकादशी का व्रत विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए अत्यंत फलदायी है जो संतान सुख से वंचित हैं या जिनकी संतान के जीवन में बाधाएं आ रही हैं। यह व्रत न केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति कराता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

वर्ष 2027 में श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत 18 अगस्त, बुधवार को रखा जाएगा। एकादशी तिथि का प्रारंभ 17 अगस्त की रात्रि को हो जाएगा, किंतु वैष्णव संप्रदाय और गृहस्थों के लिए उदया तिथि के अनुसार 18 अगस्त का दिन ही व्रत के लिए मान्य होगा। इस दिन भगवान विष्णु के 'नारायण' स्वरूप की पूजा की जाती है। इस व्रत का प्रभाव इतना गहरा है कि इसे करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। भक्त इस दिन सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य का पालन और निरंतर विष्णु मंत्रों का जाप करते हुए अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

पुत्रदा एकादशी का आध्यात्मिक विज्ञान 'संतान' को केवल भौतिक संतान से नहीं, बल्कि 'सत्-संतान' से जोड़ता है। पुराणों में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस दिन पूर्ण श्रद्धा से व्रत करता है, उसके पितृ दोषों का शमन होता है और आने वाली पीढ़ियां संस्कारवान बनती हैं। श्रावण मास की वर्षा ऋतु और प्रकृति का हरा-भरा स्वरूप भगवान विष्णु के 'शयन' काल का प्रतीक है, अतः इस समय की गई प्रार्थनाएं सीधे प्रभु के चरणों तक पहुँचती हैं। यह व्रत मन की शुद्धि और इंद्रिय निग्रह का एक सशक्त माध्यम है, जो साधक को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर के प्रति समर्पित होने की प्रेरणा देता है।

विवरण समय/तिथि (वर्ष 2027)
एकादशी तिथि प्रारंभ 17 अगस्त 2027, रात्रि 01:12 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त 18 अगस्त 2027, रात्रि 02:45 बजे तक
व्रत का दिन 18 अगस्त 2027, बुधवार
पारण का समय 19 अगस्त 2027, प्रातः 06:00 से 08:30 बजे के मध्य

शास्त्रीय पूजा विधि और व्रत के नियम

श्रावण पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि दशमी तिथि की रात्रि से ही प्रारंभ हो जाती है। दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और सात्विक विचारों के साथ निद्रा लेनी चाहिए। एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं और उन्हें पीले पुष्प, ऋतु फल, तुलसी दल, और नैवेद्य अर्पित करें।

पूजा के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करना अनिवार्य है। इसके पश्चात भगवान विष्णु के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें और 'विष्णु सहस्रनाम' या 'एकादशी व्रत कथा' का पाठ करें। ध्यान रहे कि इस दिन तुलसी के पत्तों को तोड़ना वर्जित है, अतः एक दिन पूर्व ही तुलसी दल एकत्रित कर लें। यदि संभव हो, तो इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा दें। व्रत के दौरान अन्न का त्याग करना चाहिए और केवल फलाहार या निर्जला व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

व्रत का समापन द्वादशी तिथि को पारण के साथ होता है। पारण का अर्थ है व्रत खोलना, जो कि शुभ मुहूर्त में ही किया जाना चाहिए। पारण के समय सबसे पहले भगवान विष्णु को भोग लगाएं और फिर ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करें। यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य कारणों से निर्जला व्रत नहीं रख सकता, तो वह दूध, फल या एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करके भी व्रत का पालन कर सकता है। मुख्य उद्देश्य श्रद्धा और भक्ति है, न कि केवल शारीरिक कष्ट।

विशेष टिप: पुत्रदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु को पीले फलों का भोग लगाने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। साथ ही, इस दिन 'संतान गोपाल मंत्र' का जाप करना संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपतियों के लिए अत्यंत प्रभावी सिद्ध होता है।

पौराणिक कथा: राजा महिजीत और पुत्रदा एकादशी का प्रभाव

स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, भद्रावती नगरी में महिजीत नाम का एक अत्यंत प्रतापी और धर्मपरायण राजा राज्य करता था। राजा के पास सब कुछ था—धन, वैभव, प्रजा का प्रेम और राज्य की सुरक्षा, किंतु वह सदैव एक दुख से घिरा रहता था कि उसकी कोई संतान नहीं थी। संतानहीनता के कारण राजा को न तो इस लोक में सुख मिलता था और न ही उसे परलोक की चिंता सताती थी। एक दिन राजा ने अपने राज्य के ऋषियों और मुनियों को बुलाकर अपनी व्यथा सुनाई। ऋषियों ने राजा को लोमश मुनि के पास जाने का परामर्श दिया।

राजा महिजीत ने घने जंगल में जाकर लोमश मुनि के दर्शन किए और उनसे अपनी समस्या का समाधान मांगा। मुनि ने अपने दिव्य ज्ञान से राजा के पूर्व जन्मों को देखा और बताया कि राजा ने पिछले जन्म में एक प्यासी गाय को तालाब से पानी पीने से रोका था, जिसके कारण उन्हें इस जन्म में संतान सुख से वंचित रहना पड़ा। मुनि ने राजा को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत करने का विधान बताया। राजा ने मुनि के आदेशानुसार विधि-विधान से व्रत का पालन किया और भगवान विष्णु की आराधना की।

व्रत के प्रभाव से राजा की रानी गर्भवती हुई और कुछ समय पश्चात उन्हें एक अत्यंत तेजस्वी और गुणवान पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से इस एकादशी का नाम 'पुत्रदा एकादशी' पड़ा। यह कथा हमें सिखाती है कि हमारे कर्मों का फल हमें किसी न किसी रूप में भोगना पड़ता है, किंतु भगवान विष्णु की शरण में जाने और एकादशी जैसे पवित्र व्रतों के पालन से प्रारब्ध के दोष भी मिट जाते हैं। यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि विश्वास की शक्ति का प्रमाण है जो मनुष्य को निराशा से आशा की ओर ले जाती है।

आध्यात्मिक जीवन में एकादशी का महत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

एकादशी का व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह शरीर और मन के शुद्धिकरण की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया भी है। हमारे शरीर में 70 प्रतिशत से अधिक जल है, और चंद्रमा का प्रभाव पृथ्वी के जल पर पड़ता है। एकादशी के दिन चंद्रमा की स्थिति हमारे शरीर के भीतर के जल और मन की तरंगों को प्रभावित करती है। उपवास रखने से शरीर के अंगों को विश्राम मिलता है और पाचन तंत्र की सफाई होती है। जब हम अन्न का त्याग करते हैं, तो शरीर में संचित विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं, जिससे मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता बढ़ती है।

श्रावण मास में वातावरण में नमी और सूक्ष्म जीवों की सक्रियता अधिक होती है, इसलिए आयुर्वेद भी इस दौरान हल्का और सात्विक भोजन करने की सलाह देता है। एकादशी का व्रत इस ऋतुचर्या के साथ पूर्णतः मेल खाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, एकादशी के दिन मन को विषयों से हटाकर ईश्वर में लगाने से 'चित्त' की शुद्धि होती है। जो व्यक्ति नियमित रूप से एकादशी का व्रत करता है, उसके भीतर धैर्य, संयम और करुणा जैसे गुणों का विकास होता है। यह व्रत मनुष्य को यह सिखाता है कि कैसे अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की जाए।

अंततः, श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027 का यह व्रत हमें अपने भीतर की 'संतान' यानी हमारे विचारों और कर्मों को शुद्ध करने का अवसर देता है। यदि हम अपने भीतर के अहंकार को त्याग कर भगवान के प्रति समर्पित हो जाएं, तो जीवन की सभी बाधाएं स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। इस एकादशी पर संकल्प लें कि आप न केवल अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करेंगे, बल्कि समाज और मानवता के कल्याण के लिए भी अपना योगदान देंगे। यही इस व्रत की सच्ची सार्थकता है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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