अध्याय 17 : गंगावतरण की कथा
गंगावतरण की पावन कथा
ऋषियों ने सूत जी से प्रार्थना की – “हे सूत जी! गंगा नदी को त्रिपथगा कहा जाता है। यह स्वर्ग से पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुईं? राजा भगीरथ ने ऐसा कौन-सा तप किया था जिससे गंगा उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भूतल पर आयीं? और भगवान शंकर ने उन्हें अपनी जटाओं में क्यों धारण किया? कृपया यह पूरी कथा विस्तार से सुनाइए।” सूत जी ने कहा – “यह कथा अत्यन्त पुण्यदायिनी और पापनाशिनी है। इसका श्रवण करने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।”
सगर के पुत्रों का अश्वमेध और कपिल मुनि का शाप
सूत जी ने आरम्भ किया – “प्राचीन काल में अयोध्या के राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। इन्द्र ने छल से यज्ञ का अश्व चुरा लिया और उसे कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया। सगर के साठ हजार पुत्र अश्व की खोज में निकले और उन्होंने पाताल में कपिल मुनि को ध्यानस्थ पाया। उन्होंने मुनि पर चोरी का आरोप लगाकर अपमान किया। क्रोधित कपिल मुनि ने अपने नेत्र-तेज से उन सभी राजकुमारों को भस्म कर दिया। उनकी आत्माएँ बिना जल-तर्पण के भटकने लगीं।”
भगीरथ की कठोर तपस्या
सगर के वंश में कई पीढ़ियों के बाद भगीरथ नामक प्रतापी राजा हुए। उन्हें अपने पूर्वजों की दुर्गति का ज्ञान हुआ तो उन्होंने राजपाट त्यागकर हिमालय में जाकर घोर तपस्या आरम्भ कर दी। हजारों वर्षों तक उन्होंने केवल वायु पीकर तप किया। अन्ततः ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। भगीरथ ने विनती की – “प्रभु! मेरे पूर्वजों की अस्थियों को गंगाजल से तृप्त करना है। कृपया गंगा को पृथ्वी पर भेजने की कृपा करें।” ब्रह्मा जी ने कहा – “गंगा का वेग पृथ्वी नहीं सह सकेगी, अतः तुम भगवान शिव की आराधना करो।”
तपसा महता तप्त्वा भगीरथ उदारधीः ।
गङ्गामवतरिष्यन्तीमानिन्ये पृथिवीतलम् ॥
शिव की जटाओं में गंगा का अवतरण
भगीरथ ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शंकर की आराधना की। प्रसन्न होकर शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं में समेटने का वचन दिया। तब गंगा आकाश से भयंकर वेग के साथ उतरीं। यदि शिव जी ने उन्हें अपनी जटाओं में न रोका होता, तो उनका प्रवाह पृथ्वी को चीरकर पाताल तक पहुँच जाता। शिव जी की जटाओं में गंगा वर्षों तक भटकती रहीं। तब भगीरथ ने पुनः शिव जी की स्तुति की। शिव जी ने उन्हें अपनी जटा के एक छोर से मुक्त किया।
भगीरथी का धरा पर आगमन
शिव जी की जटा से निकलकर गंगा सात धाराओं में बँट गयीं। तीन धाराएँ स्वर्ग की ओर, तीन पाताल की ओर और एक धारा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चलती हुई पृथ्वी पर अवतरित हुई। यही धारा ‘भागीरथी’ कहलायी। गंगा ने मार्ग में जह्नु ऋषि के यज्ञ-कुण्ड को डुबो दिया तो ऋषि ने क्रोध में उन्हें पी लिया। बाद में भगीरथ की प्रार्थना पर उन्होंने गंगा को अपने कान से बाहर निकाल दिया, जिससे गंगा का एक नाम ‘जाह्नवी’ भी पड़ा।
गङ्गा भागीरथी पुण्या जाह्नवी च त्रिपथगा ।
यस्याः स्मरणमात्रेण महापातकनाशनम् ॥
सगर-पुत्रों का उद्धार और कथा का फल
अन्ततः गंगा उस स्थान पर पहुँचीं जहाँ सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हुए थे। उनका जल उन भस्म हड्डियों का स्पर्श करते ही सभी राजकुमारों की आत्माएँ तृप्त हो गयीं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। भगीरथ का कार्य पूरा हुआ और गंगा सागर तक बहती चली गयीं। सूत जी ने कहा – “जो मनुष्य इस गंगावतरण की कथा का पाठ या श्रवण करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं और उसे गंगा-स्नान के समान पुण्य प्राप्त होता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे सप्तदशोऽध्यायः समाप्तः ॥