अध्याय 38 : शिव-पार्वती विवाह की कथा
शिव-पार्वती विवाह की पावन कथा
नैमिषारण्य के ऋषियों ने सूत जी से पूछा – “हे सूत जी! सती के देहत्याग के बाद भगवान शिव ने तपस्या की और फिर पार्वती से विवाह किया – यह हमने सुना है। पार्वती कौन थीं? उन्होंने शिव को पति रूप में पाने के लिए कैसी कठोर तपस्या की? और शिव-पार्वती का विवाह किस प्रकार सम्पन्न हुआ? कृपया यह मंगल-कथा विस्तार से सुनाइए।” सूत जी ने कहा – “यह कथा साक्षात कल्याणी है। शिव-पार्वती विवाह श्रवण करने से मनुष्य के वैवाहिक जीवन में सुख-शान्ति आती है और कन्याओं को सुयोग्य वर प्राप्त होता है।”
दक्ष-यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद शिव जी गहन समाधि में चले गये। इधर हिमालयराज और मैनादेवी के घर पार्वती का जन्म हुआ, जो पूर्व-जन्म की सती ही थीं। बाल्यकाल से ही पार्वती का मन शिव-चिन्तन में लगा रहता था। नारद जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम शिव को ही पति रूप में पाओगी। युवावस्था प्राप्त कर पार्वती ने पिता से आज्ञा लेकर शिव को प्रसन्न करने के लिए गंगा-तट पर कठोर तप आरम्भ किया।
हिमाचलसुता देवी पार्वती तपसि स्थिता ।
निराहारा निरालम्बा ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यगा ।।
वर्षास्वाकाशसंस्थाना शिशिरे सलिलाशया ।
तपश्चचार दुश्चारं शिवप्राप्तिं समुद्दिश्य ॥
शिव की परीक्षा और पार्वती का दृढ़ निश्चय
पार्वती के इस तप को देखकर शिव जी ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का वेष धारण कर वहाँ आये और शिव की निन्दा करने लगे – “हे बालिके! शिव तो भूत-प्रेतों के साथी, नग्न, कापालिक हैं। तुम ऐसे वर को क्यों चाहती हो?” पार्वती ने क्रोध से कहा – “तुम शिव का स्वरूप नहीं जानते। वे सबके आदि कारण और परब्रह्म हैं।” तब शिव जी ने प्रसन्न होकर अपना वास्तविक रूप प्रकट किया और पार्वती से विवाह का वचन दिया।
विवाह का आयोजन और बारात का वर्णन
हिमालयराज ने बड़े समारोह से विवाह का आयोजन किया। शिव जी की बारात में भूत-प्रेत, पिशाच, सिद्ध, योगी, गन्धर्व, देवता और ब्रह्मा-विष्णु सब सम्मिलित थे। शिव जी वृषभ पर सवार थे। उनके मस्तक पर चन्द्रमा, गले में नाग और शरीर पर भस्म थी। पार्वती-माता मैना ने जब शिव का यह रूप देखा तो मूर्छित हो गयीं, किन्तु हिमालय ने समझाया कि शिव ही परब्रह्म हैं। तब विधिवत कन्यादान हुआ।
भूतप्रेतपिशाचाश्च सिद्धगन्धर्वराक्षसाः ।
सर्वे शिवस्य बाराते देवा ब्रह्मपुरोगमाः ।।
वृषभारूढमायान्तं शिवं दृष्ट्वा हिमालयः ।
पूजयामास विधिवद्धर्यादिकैर्यथोचितैः ॥
विवाह का फल और कथा-श्रवण का माहात्म्य
विवाह के उपरान्त शिव-पार्वती कैलाश पर्वत पर विराजमान हुए। सूत जी ने कहा – “जो मनुष्य इस शिव-पार्वती विवाह की कथा का श्रवण या पाठ करता है, उसे उत्तम पति या पत्नी की प्राप्ति होती है और दाम्पत्य जीवन सुखमय रहता है। स्त्रियाँ सौभाग्यवती होती हैं और कन्याएँ सुयोग्य वर प्राप्त करती हैं।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे अष्टात्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥