अध्याय 26 : स्वारोचिष आदि मन्वन्तर
स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष मन्वन्तर
शौनकादि ऋषियों ने हाथ जोड़कर कहा – “हे सूत जी! आपने स्वायम्भुव मनु के प्रथम मन्वन्तर का वर्णन कर हमें आनन्दित किया। अब कृपया हमें दूसरे स्वारोचिष, तीसरे उत्तम, चौथे तामस, पाँचवें रैवत और छठे चाक्षुष मन्वन्तरों का विस्तार से वर्णन सुनाइए। उन मन्वन्तरों में कौन-कौन से मनु, इन्द्र, देवता और सप्तर्षि हुए? भगवान विष्णु ने किन-किन अवतारों को धारण किया? कृपया यह पुण्य कथा हमें सुनाकर कृतार्थ करें।”
सूत जी बोले – “हे ऋषियो! मन्वन्तरों की कथा ब्रह्माजी ने स्वयं प्रजापतियों को सुनायी थी। दूसरे मन्वन्तर में मनु का नाम स्वारोचिष था। ये बड़े ही धर्मात्मा और तपस्वी थे। इनके पिता का नाम अग्नि था, इसलिए इन्हें आग्नेय भी कहा जाता है। इस मन्वन्तर में इन्द्र का नाम विपश्चित था और देवता पारावत तथा तुषित कहलाते थे। सप्तर्षियों में ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, दत्तोली, ऋषभ, निश्चर और अर्वरीवान् थे। भगवान विष्णु ने इस मन्वन्तर में विभु नामक अवतार धारण किया और देवताओं की सहायता की।”
स्वारोचिषो द्वितीयस्तु मनुरग्नेः सुतोऽभवत् ।
विपश्चित् सुरराट् तत्र पारावतगणाः सुराः ।।
ऊर्जस्तम्भस्तथा प्राणो दत्तोली ऋषभस्तथा ।
निश्चरश्चार्वरीवांश्च सप्तासन् ऋषयोऽमलाः ॥
उत्तम, तामस और रैवत मन्वन्तर
तीसरे उत्तम मन्वन्तर के मनु प्रियव्रत के पुत्र उत्तम हुए। इन्द्र का नाम सुशान्ति था और देवता सुधाम, सत्य, शिव, प्रतर्दन और वशवर्ती कहलाते थे। सप्तर्षियों में वसिष्ठ के पुत्र सुवेद, सुनेत्र, सुमति आदि थे। भगवान विष्णु ने सत्यसेन नामक अवतार लिया। चौथे तामस मन्वन्तर में मनु तामस हुए, जो प्रियव्रत के ही वंशज थे। इन्द्र का नाम शिखी था और देवता सत्यक, हरि, वीर आदि थे। पाँचवें रैवत मन्वन्तर के मनु ऋतवाक् थे। यहाँ इन्द्र विभु नाम से प्रसिद्ध हुए और देवता भूतरय, वैकुण्ठ आदि थे। रैवत मन्वन्तर के सप्तर्षियों में हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु आदि प्रमुख थे।
तृतीय उत्तमो नाम प्रियव्रतसुतो मनुः ।
सुशान्तिर्नाम देवेन्द्रः सुधामाद्यास्तु देवताः ।।
चतुर्थस्तामसो मन्वन्तरे तामसो मनुः ।
शिखीन्द्रो हरयो देवाः सप्तर्षीनपि मे शृणु ॥
चाक्षुष मन्वन्तर और भगवान् का अवतार
छठे चाक्षुष मन्वन्तर में मनु का नाम चाक्षुष था, जो चक्षु ऋषि के पुत्र थे। इस मन्वन्तर के इन्द्र का नाम मनोजव था और देवता आप्य, प्रभूत, ऊर्ज आदि थे। सप्तर्षियों में भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधाम, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु थे। भगवान विष्णु ने इस मन्वन्तर में अजित नामक अवतार धारण कर समुद्र-मन्थन में देवताओं की सहायता की थी और अमृत की रक्षा की थी। चाक्षुष मन्वन्तर में ही पृथु का राज्याभिषेक हुआ और पृथ्वी का दोहन हुआ।
मन्वन्तर-श्रवण का पुण्य-फल
सूत जी ने कहा – “हे ऋषियो! इन पाँच मन्वन्तरों का विस्तृत वर्णन सुनकर मनुष्य के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर में भगवान विष्णु ने अवतार लेकर धर्म की रक्षा की है। जो इस अध्याय का पाठ करता है, वह सब मन्वन्तरों का फल प्राप्त करता है और अन्त में विष्णुलोक को जाता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे षड्विंशोऽध्यायः समाप्तः ॥