अध्याय 20 : नरकों और कर्मफल का वर्णन
नरकों का स्वरूप और कर्मों का फल
ऋषियों ने भयभीत होकर पूछा – “हे सूत जी! मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार मृत्यु के बाद किन-किन लोकों में जाता है? पाप करने पर कौन-कौन से नरकों में गिरना पड़ता है? और उन नरकों की यातना कैसी है? कृपया इसका स्पष्ट वर्णन कीजिए, जिससे हम सब सावधान हो सकें और पाप-कर्मों से बचें।” सूत जी ने कहा – “यह प्रश्न मनुष्य-मात्र के लिए कल्याणकारी है। नरकों का वर्णन सुनकर मनुष्य का हृदय काँप उठता है, किन्तु जो इसका श्रवण करता है, वह सदाचार की ओर अग्रसर होता है।”
यमराज की नगरी और नरकों की संख्या
मृत्यु के बाद प्राणी यमदूतों द्वारा यमपुरी ले जाया जाता है। यमराज की नगरी अत्यन्त विशाल है और धर्मराज स्वयं वहाँ बैठकर प्राणियों के शुभ-अशुभ कर्मों का लेखा-जोखा करते हैं। चित्रगुप्त उनके समक्ष कर्मों का विवरण पढ़ते हैं। पापी जीवों को कुल अट्ठाईस प्रमुख नरकों में डाला जाता है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं – तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, कृमिभोजन, संदंश, तपन, महातपन और अवीचि।
तामिस्राद्याः स्मृता घोरा नरका यमशासने ।
यातनादेहिनां तेषु कर्मदोषप्रदर्शिनी ॥
पाप और उनके दण्ड का विवरण
जो मनुष्य झूठी गवाही देता है, परस्त्रीगामी होता है या दूसरों की निन्दा करता है, वह तामिस्र नरक में जाता है। जो दूसरों के धन का अपहरण करता है, वह अन्धतामिस्र में अन्धेरे में तड़पता है। जो हिंसा करता है, वह रौरव में राक्षसों द्वारा खाया जाता है। माता-पिता की हत्या करने वाला महारौरव में पड़ता है। जो मदिरा पान करता है, वह कुम्भीपाक में खौलते तेल में तला जाता है। जो गुरु की निन्दा करता है, वह कालसूत्र में असह्य वेदना भोगता है। इस प्रकार प्रत्येक पाप का निश्चित दण्ड है।
नरकों की भयानक यातनाएँ
असिपत्रवन में पापी को तलवार के समान तेज पत्तों से काटा जाता है। कृमिभोजन नरक में कीड़े शरीर को खाते रहते हैं। संदंश नरक में गरम चिमटियों से माँस नोचा जाता है। तपन और महातपन में अग्नि की ज्वाला में जलाया जाता है। अवीचि नरक सबसे अधिक भयानक है, जहाँ पापी अत्यन्त गहरे अन्धकूप में गिरता है और कभी बाहर नहीं निकल पाता। ये नरक भोगने के बाद प्राणी फिर से नीच योनियों में जन्म लेता है।
कृमिभोज्यास्तु पापिष्ठाः कीटैर्भक्ष्यन्ति चासकृत् ।
यावत्पापक्षयं नैति तावत्तिष्ठन्ति ते ह्रदे ॥
पुण्य कर्मों का फल और स्वर्ग-प्राप्ति
सूत जी ने बताया कि जो मनुष्य सत्य बोलता है, दान करता है, तीर्थ-यात्रा करता है, माता-पिता की सेवा करता है और अहिंसा का पालन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। स्वर्ग में दिव्य सुख भोगने के बाद वह पुण्य क्षीण होने पर पुनः श्रेष्ठ कुल में जन्म लेता है। सबसे उत्तम गति तो भगवान विष्णु या शिव की भक्ति से मिलने वाला मोक्ष है, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।
नरक-वर्णन श्रवण का लाभ
“हे ऋषियो! इस नरक-वर्णन को सुनकर मनुष्य को चाहिए कि वह पाप-कर्मों से दूर रहे और धर्म-पथ पर चले। यह अध्याय सुनने मात्र से मनुष्य के मन में वैराग्य उत्पन्न होता है और वह शुभ कर्मों में प्रवृत्त होता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे विंशोऽध्यायः समाप्तः ॥