अध्याय 40 : तारकासुर वध और कार्तिकेय का माहात्म्य
तारकासुर का वध और कुमार कार्तिकेय का अतुल माहात्म्य
नैमिषारण्य के ऋषियों ने सूत जी से निवेदन किया – “हे लोमहर्षण! कार्तिकेय जी ने देव-सेनापति बनकर तारकासुर का वध किस प्रकार किया? वह युद्ध कितना भयंकर था? तारकासुर कौन था और उसे क्या-क्या शक्तियाँ प्राप्त थीं? तथा कार्तिकेय जी के माहात्म्य और उनकी उपासना का क्या फल है? कृपया हमें यह सब सुनाइए।” सूत जी ने कहा – “कार्तिकेय का तारकासुर-वध देवताओं की आशाओं की पूर्ति था। यह कथा शत्रु-पराजय और अभय-प्राप्ति का उत्तम साधन है।”
तारकासुर ने ब्रह्मा जी से अद्भुत वरदान पा रखा था कि शिव-पुत्र के अतिरिक्त कोई उसे नहीं मार सकेगा। वह अत्यन्त मायावी, बलशाली और क्रूर था। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को वहाँ से निकाल दिया था। देवता कार्तिकेय के जन्म के पश्चात् उनके पास गये और प्रार्थना की – “हे देव-सेनापते! तारकासुर के अत्याचारों से हमारी रक्षा कीजिए।” कार्तिकेय ने मयूर पर सवार होकर अपनी शक्ति (भाला) लेकर युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
तारकासुरमासाद्य देवसेनापतिः स्वयम् ।
युद्धाय सज्जतां चक्रे मयूरस्थः षडाननः ।।
तारकोऽपि महामायी दानवानां महारथः ।
प्रतियुद्धाय निर्यातो महासुरचमूवृतः ॥
भीषण युद्ध और तारकासुर की माया
दोनों सेनाओं में भयंकर संग्राम छिड़ गया। तारकासुर ने अनेक प्रकार की माया का प्रयोग किया – कभी अग्नि-वर्षा, कभी पर्वत-वर्षा, कभी अन्धकार। कार्तिकेय ने अपने बाणों से उसकी सब मायाओं को नष्ट कर दिया। तारकासुर ने अनेक रूप धारण किये, किन्तु कार्तिकेय ने अपने छः मुखों से मन्त्र-बाण चलाकर उसे घायल कर दिया। अन्त में तारक ने पर्वताकार रूप धारण कर कार्तिकेय पर आक्रमण किया, तब कार्तिकेय ने अपनी अमोघ शक्ति का संधान किया।
तारकासुर का अन्त और देवताओं का आनन्द
कार्तिकेय ने भगवान शिव द्वारा प्रदत्त शक्ति को मन्त्राभिमन्त्रित करके तारकासुर की छाती में मार दिया। वह शक्ति तारक का हृदय भेदकर पाताल तक चली गयी और फिर लौटकर कार्तिकेय के हाथ में आ गयी। तारकासुर पर्वत के समान गिरकर मर गया। उसके मरते ही देवताओं ने पुष्प-वर्षा की और जय-जयकार किया। इन्द्र ने कार्तिकेय को हृदय से लगा लिया और कहा – “हे कुमार! तुमने हम सबकी रक्षा की। तुम देव-सेनापति पद के सच्चे अधिकारी हो।”
शक्त्या भिन्नहृदयस्तु तारकः प्रापतद्भुवि ।
हतशत्रौ महासेनो देवानां हर्षमादधत् ।।
इन्द्रो देवगणैः सार्धं प्रणम्य शिखिवाहनम् ।
तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्देवसेनापतिं शिशुम् ॥
कार्तिकेय का माहात्म्य और उपासना-फल
सूत जी ने कहा – “कार्तिकेय बालक होते हुए भी अतुल तेजस्वी हैं। ये भगवान शिव के अंश हैं और विद्या, बल, बुद्धि और सन्तान के दाता हैं। जो मनुष्य कार्तिकेय की इस विजय-गाथा का श्रवण करता है, वह शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है और उसे अभय पद की प्राप्ति होती है। कार्तिकेय का व्रत और पूजन करने से सन्तान-बाधा दूर होती है और पुत्र-प्राप्ति होती है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे चत्वारिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥