अध्याय 25 : मन्वन्तरों का वर्णन – स्वायम्भुव मनु
मन्वन्तरों की कल्पना और स्वायम्भुव मनु का प्रथम मन्वन्तर
ऋषियों ने प्रश्न किया – “हे सूत जी! आपने कल्प और मन्वन्तरों का उल्लेख किया था। अब हम विशेष रूप से मन्वन्तरों का विस्तृत ज्ञान चाहते हैं। कितने मन्वन्तर होते हैं? प्रथम मनु स्वायम्भुव कौन थे? उनके समय में सप्तर्षि, इन्द्र और देवता कौन थे? तथा उस मन्वन्तर की प्रमुख घटनाएँ क्या थीं? कृपया यह सब हमें सुनाइए।” सूत जी ने कहा – “यह प्रश्न ब्रह्माण्ड के इतिहास का सार है। एक कल्प में चौदह मन्वन्तर होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर का अपना मनु, इन्द्र, देवता और सप्तर्षि होते हैं।”
स्वायम्भुव मनु – प्रथम मनु
वर्तमान कल्प का प्रथम मन्वन्तर स्वायम्भुव मनु का है। स्वायम्भुव मनु ब्रह्मा जी के शरीर से उत्पन्न हुए थे और इनकी पत्नी शतरूपा थीं। इन्होंने प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्रों तथा आकूति, प्रसूति नामक दो कन्याओं को जन्म दिया। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने कठोर तपस्या करके अटल स्थान पाया। प्रियव्रत ने सप्तद्वीपी पृथ्वी पर शासन किया। इस मन्वन्तर में यज्ञ पुरुष ही इन्द्र थे और तुषित नामक बारह देवता थे।
स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं सप्तर्षयः सनातनाः ।
मरीच्यत्र्यङ्गिरसः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वशिष्ठश्च महाभागाः सप्त ब्रह्मविदां वराः ॥
चौदह मन्वन्तरों का संक्षिप्त परिचय
सूत जी ने सभी चौदह मन्वन्तरों के नाम बताए – स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्ष-सावर्णि, ब्रह्म-सावर्णि, धर्म-सावर्णि, रुद्र-सावर्णि, रौच्य और भौत्य। वर्तमान में सातवाँ वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। प्रत्येक मन्वन्तर का अपना धर्म-विधान, वेद-व्यवस्था और अवतार होते हैं। स्वायम्भुव मन्वन्तर में भगवान विष्णु ने यज्ञपति के रूप में अवतार लिया था और धर्म का प्रवर्तन किया था।
मन्वन्तर-वर्णन का आध्यात्मिक सन्देश
मन्वन्तरों का यह चक्र काल के असीम विस्तार को दर्शाता है और मनुष्य को यह सिखाता है कि यह सृष्टि अनादि और अनन्त है। जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न मन्वन्तरों में भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेता रहता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि इस दुर्लभ मानव-देह में धर्म का आचरण करे और मोक्ष का प्रयास करे।
मन्वन्तराणि चत्वारि व्यतीतानि शुभव्रताः ।
वैवस्वतोऽयं सप्तमो वर्तते मनुरुत्तमः ॥
अध्याय-फल
सूत जी बोले – “जो मनुष्य स्वायम्भुव मनु और मन्वन्तरों के इस वर्णन का श्रवण करता है, वह काल के बन्धन को पार कर जाता है और उसे पितृ-लोक की प्राप्ति होती है। यह अध्याय ब्रह्म पुराण के मूल सिद्धान्तों का आधार है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे पञ्चविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥