अध्याय 35 : दक्ष यज्ञ का आयोजन
दक्ष यज्ञ का आयोजन और विनाश-लीला
शौनकादि ऋषियों ने आग्रह किया – “हे सूत जी! दक्ष प्रजापति के यज्ञ का आयोजन तो पुराणों में बहुत प्रसिद्ध है। वह यज्ञ क्यों किया गया था? उसमें भगवान शिव को क्यों नहीं बुलाया गया? सती ने अपने प्राण क्यों त्यागे? और शिव जी ने उस यज्ञ का विध्वंस कैसे किया? कृपया दक्ष-यज्ञ की सम्पूर्ण कथा का वर्णन कीजिए।” सूत जी ने कहा – “यह कथा श्रवण करने मात्र से ही अहंकार का नाश करती है और भगवान शिव की भक्ति का दृढ़ीकरण करती है। दक्ष-यज्ञ का वृत्तान्त सुनने से मनुष्य के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।”
यज्ञ की तैयारी और शिव का अपमान
दक्ष प्रजापति ने एक बार प्रयाग के पास विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सब देवता, ऋषि, गन्धर्व और प्रजापति आमन्त्रित किये गये, किन्तु अपने दामाद भगवान शंकर को जान-बूझकर नहीं बुलाया। इसका कारण था शिव जी के प्रति दक्ष का अपमान-भाव। जब सती ने अपने पति शिव जी से बिना बुलाये यज्ञ में जाने की आज्ञा माँगी तो शिव जी ने समझाया कि बिना बुलाये जाने से अपमान ही मिलेगा। किन्तु सती पिता का यज्ञ देखने के लिए हठ करके चली गयीं।
दक्षेण यज्ञः प्रथितः प्रयागे परमाद्भुतः ।
तत्राहूता गणाः सर्वे शंकरस्तु न पूजितः ।।
सती गता विनाहूता पितुर्यज्ञं दिदृक्षया ।
दृष्ट्वापमानिता तेन तत्याज स्वतनुं ततः ॥
सती का आत्मदाह और वीरभद्र का प्राकट्य
यज्ञ-स्थल पर पहुँचकर सती ने देखा कि शिव जी के लिए न तो हवि-भाग रखा गया है और न ही कोई आसन। दक्ष ने सबके सामने शिव-निन्दा की। यह सुनकर सती का हृदय विकल हो उठा। उन्होंने अपने ही योगाग्नि से देह त्याग दी। जब शिव जी को यह समाचार मिला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया और उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को उत्पन्न किया। वीरभद्र ने भद्रकाली सहित यज्ञ-स्थल पर जाकर विध्वंस मचा दिया। उन्होंने दक्ष का सिर काट दिया और यज्ञ-मण्डप को जला दिया।
दक्ष का उद्धार और यज्ञ की पूर्णता
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने दया कर दी। उन्होंने दक्ष के कटे सिर के बदले एक बकरे का सिर लगा दिया और उसे जीवित कर दिया। दक्ष ने शिव जी से क्षमा-याचना की और शिव-भक्त बन गये। तब यज्ञ पूर्ण हुआ और सब देवताओं ने शिव-स्तुति की।
दक्ष-यज्ञ कथा का फल
सूत जी बोले – “यह कथा भगवान शिव की भक्ति का उत्तम साधन है। जो मनुष्य दक्ष-यज्ञ की इस पावन कथा का श्रवण या पाठ करता है, वह सब यज्ञों का फल प्राप्त करता है और अन्त में शिवलोक को जाता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥