अध्याय 37 : वीरभद्र द्वारा यज्ञ विध्वंस और देवताओं का स्तव
वीरभद्र का रौद्र पराक्रम और देवताओं की शिव-स्तुति
शौनकादि ऋषियों ने पूछा – “हे सूत जी! वीरभद्र कौन थे? उन्होंने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किस प्रकार किया? किन-किन देवताओं को कैसे दण्ड मिला? और उसके पश्चात देवताओं ने भगवान शिव की किस प्रकार स्तुति की, जिससे शिव जी प्रसन्न हुए? कृपया यह सब हमें विस्तार से सुनाइए।” सूत जी बोले – “वीरभद्र भगवान शिव के रौद्र अंश हैं। उनका रूप सृष्टि-प्रलय दोनों करने में समर्थ है। उनके पराक्रम की कथा सुनने से मनुष्य निर्भय और शिव-भक्त बन जाता है।”
भगवान शिव की जटा से वीरभद्र प्रकट हुए। वे हजार भुजाओं वाले, तीन नेत्रधारी, चन्द्रमा को धारण किये, शूल-त्रिशूल-खड्ग-परशु आदि अस्त्रों से सुसज्जित थे। उनका शरीर काल-मेघ के समान काला था और उनके नेत्र सूर्य-चन्द्र के समान तेजस्वी थे। भद्रकाली नामक भयंकर देवी सहित वे यज्ञ-स्थल पर पहुँचे। भूत-प्रेत, पिशाच, योगिनी और डाकिनी सब साथ थे।
जटाभ्यां शम्भुनिःसृष्टो वीरभद्रो महाबलः ।
सहस्रभुजदेहस्तु त्रिनेत्रो ज्वलिताननः ।।
भद्रकालीयुतो घोरो डाकिनीशतसंवृतः ।
यज्ञवाटमनुप्राप्तो दक्षकोपप्रशान्तये ॥
देवताओं का दण्ड और यज्ञ-विनाश
वीरभद्र ने सर्वप्रथम यज्ञ-मण्डप की वेदी को गिरा दिया। फिर क्रमशः इन्द्र को पकड़कर उनकी भुजाएँ मरोड़ दीं, अग्निदेव की जिह्वा खींच ली, यमराज का दण्ड तोड़ दिया, वरुण का पाश काट डाला, वायु को घूँसों से मारा, कुबेर की दाढ़ी नोच डाली और चन्द्रमा को लातों से कुचल दिया। सूर्य का रथ तोड़ दिया और अश्विनीकुमारों को मूर्छित कर दिया। भृगु मुनि, जिन्होंने शिव-निन्दा का समर्थन किया था, उनकी मूँछें नोच डालीं। पूषा देवता के सब दाँत तोड़ दिये, क्योंकि उन्होंने दक्ष-पक्ष लेकर हँसी उड़ाई थी। यज्ञ का मुख मृग के रूप में भाग गया, तब वीरभद्र ने उसे पकड़कर मार डाला।
इन्द्रस्याक्रम्य वक्षस्तु सहस्राक्षोऽपतद्भुवि ।
अग्नेर्जिह्वा समुत्पाट्य यमदण्डमचूर्णयत् ।।
भृगोरुत्पाट्य मूर्धानं पूष्णो दन्तानपातयत् ।
वीरभद्रो महाक्रोधाद् यज्ञं विध्वंसयन् बली ॥
दक्ष का वध और देवताओं की शिव-स्तुति
अन्त में वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति का सिर धड़ से अलग कर यज्ञ-अग्नि में डाल दिया। यह देख ब्रह्मा जी ने सब देवताओं को लेकर कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की स्तुति की। उन्होंने कहा – “हे महादेव! आप ही सृष्टि के कर्ता, पालक और संहारक हैं। आपकी माया से सब मोहित हैं। हम आपकी शरण में आये हैं।”
शिव की प्रसन्नता और यज्ञ की पूर्णता
भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा – “देवताओं! मैंने तुम्हें दण्ड इसलिए दिया कि तुम अहंकारवश मेरा अपमान सहते रहे। अब तुम पुनः अपने स्थान पर जाओ और यज्ञ को पूर्ण करो।” तब शिव जी ने वीरभद्र को शान्त किया और दक्ष को बकरे का सिर देकर जीवित कर दिया। सब देवता आनन्दित हुए।
सूत जी बोले – “यह वीरभद्र-स्तव सुनने से मनुष्य की सब बाधाएँ नष्ट होती हैं।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे सप्तत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥