अध्याय 24 : योग तथा ज्योतिष का संक्षिप्त वर्णन
योग-विद्या और ज्योतिष-ज्ञान का सार
ऋषियों ने हाथ जोड़कर कहा – “हे सूत जी! ग्रहों और काल के वर्णन के साथ ही हम योग और ज्योतिष के मूल तत्वों को भी जानना चाहते हैं। ब्रह्म पुराण में योग का क्या स्वरूप बताया गया है? और ज्योतिष के कितने अंग हैं, जिनसे काल-ज्ञान होता है? कृपया संक्षेप में यह ज्ञान प्रदान कीजिए, जिससे हम आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ काल के प्रभाव को भी समझ सकें।” सूत जी ने कहा – “योग और ज्योतिष दोनों ही वेदों के नेत्र हैं। योग से आत्म-ज्ञान होता है और ज्योतिष से काल-ज्ञान। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।”
योग का स्वरूप और उसके भेद
योग का अर्थ है ‘चित्तवृत्तियों का निरोध’। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार योग के आठ अंग हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यम पाँच हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। नियम भी पाँच हैं – शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान। प्राणायाम से वायु का नियन्त्रण होता है और प्रत्याहार से इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी होती हैं। धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों को संयम कहते हैं, जिससे अष्टसिद्धियों और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यमो नियमश्चासनं प्राणायामः प्रत्याहारः ।
धारणा ध्यानमेवं च समाधिरष्टमोऽङ्गिकः ॥
ज्योतिष के तीन स्कन्ध
ज्योतिष-शास्त्र के तीन मुख्य भाग हैं – सिद्धान्त, होरा और संहिता। सिद्धान्त में ग्रह-नक्षत्रों की गणितीय गति का वर्णन है। होरा (जातक) में जन्म-कुण्डली और ग्रहों के शुभाशुभ फल का विचार किया जाता है। संहिता में शकुन, वर्षा, भूकम्प, उल्कापात आदि प्राकृतिक घटनाओं का फल बताया जाता है। इन्हीं के आधार पर तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण – ये पाँच अंग पञ्चाङ्ग बनाते हैं।
योग और ज्योतिष का सामञ्जस्य
ज्योतिष में भी योग शब्द का प्रयोग होता है, जैसे विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान आदि सत्ताईस योग। ये योग सूर्य-चन्द्र की गति पर आधारित हैं और मुहूर्त-निर्धारण में सहायक हैं। अध्यात्म-योग के द्वारा मनुष्य अपने भीतर छिपे काल-तत्व को जान लेता है और वह ग्रहों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है। योगी की कुण्डली के ग्रह उसे बाँध नहीं सकते, क्योंकि वह आत्म-स्वरूप में स्थित होता है।
योगेन चित्तशुद्धिः स्याज्ज्योतिषा कालनिर्णयः ।
उभाभ्यां ज्ञानसम्पन्नो मुक्तिमेवाधिगच्छति ॥
अध्याय-श्रवण का फल
सूत जी बोले – “यह योग और ज्योतिष का संक्षिप्त वर्णन ब्रह्मा जी ने स्वयं प्रतिपादित किया था। इसका श्रवण करने से मनुष्य की बुद्धि तीव्र होती है और वह आत्म-कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे चतुर्विंशोऽध्यायः समाप्तः ॥