ज्ञान षटक (अध्याय १३-१८) अध्याय १४ · कुल २७ श्लोक 5 मिनट अध्ययन

गुणत्रय विभाग योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १४ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों – सत्‍व, रजस् और तमस् – का विस्तार से वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि ये गुण जीव को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण क्या हैं, और कैसे इनसे पार पाया जाए।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १४ (गुणत्रय विभाग योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों – सत्‍व, रजस् और तमस् – का विस्तार से वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि ये गुण जीव को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण क्या हैं, और कैसे इनसे पार पाया जाए।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)

श्लोक २६ - २७
अध्याय १४ · श्लोक २६

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६॥

हिंदी अर्थ

और जो अव्यभिचार (निष्काम) भक्तियोग द्वारा मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य हो जाता है।

अध्याय १४ · श्लोक २७

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७॥

हिंदी अर्थ

क्योंकि मैं ही ब्रह्म (वेदों का प्रतिपाद्य) का, अमृत का, अविनाशी का, शाश्वत धर्म का और एकान्त सुख का आधार (प्रतिष्ठा) हूँ।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
गुणत्रय विभाग योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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