मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६॥
और जो अव्यभिचार (निष्काम) भक्तियोग द्वारा मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य हो जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १४ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों – सत्व, रजस् और तमस् – का विस्तार से वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि ये गुण जीव को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण क्या हैं, और कैसे इनसे पार पाया जाए।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १४ (गुणत्रय विभाग योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों – सत्व, रजस् और तमस् – का विस्तार से वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि ये गुण जीव को कैसे बाँधते हैं, उनके लक्षण क्या हैं, और कैसे इनसे पार पाया जाए।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६॥
और जो अव्यभिचार (निष्काम) भक्तियोग द्वारा मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य हो जाता है।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७॥
क्योंकि मैं ही ब्रह्म (वेदों का प्रतिपाद्य) का, अमृत का, अविनाशी का, शाश्वत धर्म का और एकान्त सुख का आधार (प्रतिष्ठा) हूँ।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।