सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६॥
सत् शब्द का प्रयोग सद्भाव (वस्तु की सत्ता) और साधुभाव (उत्तमता) के अर्थ में होता है। तथा हे पार्थ! प्रशस्त (शुभ) कर्म में भी सत् शब्द का प्रयोग किया जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १७ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा – सात्विक, राजसिक और तामसिक – का वर्णन करते हैं और भोजन, यज्ञ, तप, दान के तीन भेद बताते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १७ (श्रद्धात्रय विभाग योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा – सात्विक, राजसिक और तामसिक – का वर्णन करते हैं और भोजन, यज्ञ, तप, दान के तीन भेद बताते हैं।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६॥
सत् शब्द का प्रयोग सद्भाव (वस्तु की सत्ता) और साधुभाव (उत्तमता) के अर्थ में होता है। तथा हे पार्थ! प्रशस्त (शुभ) कर्म में भी सत् शब्द का प्रयोग किया जाता है।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७॥
यज्ञ, तप और दान में स्थिति (निष्ठा) को भी "सत्" कहा जाता है, तथा उस परमात्मा के लिए किया गया कर्म भी "सत्" ही कहलाता है।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८॥
हे पार्थ! जो यज्ञ (हवन) किया जाता है, जो दान दिया जाता है, जो तप तपा जाता है और जो भी कर्म बिना श्रद्धा के किया जाता है – वह "असत्" कहलाता है। उसका कोई फल इस लोक में नहीं मिलता और न ही परलोक में।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।