ज्ञान षटक (अध्याय १३-१८) अध्याय १८ · कुल ७८ श्लोक 6 मिनट अध्ययन

मोक्ष संन्यास योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १८ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का आदेश देते हैं। यह अध्याय मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
किसी भी श्लोक पर तुरंत पहुँचें: कुल ७८ श्लोक
श्लोक १ श्लोक २ श्लोक ३ श्लोक ४ श्लोक ५ श्लोक ६ श्लोक ७ श्लोक ८ श्लोक ९ श्लोक १० श्लोक ११ श्लोक १२ श्लोक १३ श्लोक १४ श्लोक १५ श्लोक १६ श्लोक १७ श्लोक १८ श्लोक १९ श्लोक २० श्लोक २१ श्लोक २२ श्लोक २३ श्लोक २४ श्लोक २५ श्लोक २६ श्लोक २७ श्लोक २८ श्लोक २९ श्लोक ३० श्लोक ३१ श्लोक ३२ श्लोक ३३ श्लोक ३४ श्लोक ३५ श्लोक ३६ श्लोक ३७ श्लोक ३८ श्लोक ३९ श्लोक ४० श्लोक ४१ श्लोक ४२ श्लोक ४३ श्लोक ४४ श्लोक ४५ श्लोक ४६ श्लोक ४७ श्लोक ४८ श्लोक ४९ श्लोक ५० श्लोक ५१ श्लोक ५२ श्लोक ५३ श्लोक ५४ श्लोक ५५ श्लोक ५६ श्लोक ५७ श्लोक ५८ श्लोक ५९ श्लोक ६० श्लोक ६१ श्लोक ६२ श्लोक ६३ श्लोक ६४ श्लोक ६५ श्लोक ६६ श्लोक ६७ श्लोक ६८ श्लोक ६९ श्लोक ७० श्लोक ७१ श्लोक ७२ श्लोक ७३ श्लोक ७४ श्लोक ७५ श्लोक ७६ श्लोक ७७ श्लोक ७८
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १८ (मोक्ष संन्यास योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का आदेश देते हैं। यह अध्याय मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ ४ / ४)

श्लोक ७६ - ७८
अध्याय १८ · श्लोक ७६

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६॥

हिंदी अर्थ

हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस अद्भुत एवं पुण्यमय संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ।

अध्याय १८ · श्लोक ७७

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥७७॥

हिंदी अर्थ

और हरि के उस अत्यद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

अध्याय १८ · श्लोक ७८

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८॥

हिंदी अर्थ

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ श्री (लक्ष्मी), विजय, भूति (ऐश्वर्य) और ध्रुव नीति (निश्चित नीति) है – ऐसा मेरा मत है।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
मोक्ष संन्यास योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
सम्पूर्ण गीता इंडेक्स

श्रीमद्भगवद्गीता के सभी १८ अध्यायों का संकलन एवं श्लोक खोजें।

गीता मुख्य पृष्ठ

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

सफलतापूर्वक कॉपी किया गया!