बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१॥
विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धृति (दृढ़ता) द्वारा आत्मा को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग करके तथा राग-द्वेष को दूर करके...
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १८ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का आदेश देते हैं। यह अध्याय मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १८ (मोक्ष संन्यास योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का आदेश देते हैं। यह अध्याय मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ ३ / ४)
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१॥
विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धृति (दृढ़ता) द्वारा आत्मा को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग करके तथा राग-द्वेष को दूर करके...
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२॥
एकान्तसेवी, अल्पाहारी, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, नित्य ध्यानयोग में तत्पर, और वैराग्य का आश्रय लेकर...
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३॥
अहंकार, बल (घमण्ड), दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह (संग्रह) का त्याग करके, ममता से रहित और शान्त होकर – वह ब्रह्मभूत होने के योग्य हो जाता है।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४॥
ब्रह्मभूत (ब्रह्मरूप) हुआ, प्रसन्नचित्त पुरुष न तो शोक करता है और न कामना करता है। सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव रखने वाला वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त होता है।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५॥
भक्ति के द्वारा वह मुझे तत्त्व से जान लेता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ। तत्पश्चात् मुझे तत्त्व से जानकर वह तुरन्त मुझमें ही प्रवेश कर जाता है।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६॥
सब कर्मों को सदा करता हुआ भी, मेरे शरण हुआ मनुष्य मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७॥
सम्पूर्ण कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, निरन्तर मुझमें चित्त लगाने वाला बन।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८॥
मुझमें चित्त लगाने वाला तू मेरी कृपा से सब दुर्गम विपत्तियों को पार कर जाएगा। परन्तु यदि तू अहंकार से नहीं सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा।
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९॥
यदि तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मानता है कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा", तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है; तेरा स्वभाव ही तुझे (युद्ध में) प्रवृत्त करेगा।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६०॥
हे कौन्तेय! अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधा हुआ तू मोहवश जिस कर्म को नहीं करना चाहता, उसे भी तू विवश होकर करेगा।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१॥
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में ईश्वर स्थित है, जो माया द्वारा सब प्राणियों को यन्त्र पर बैठे हुए की भाँति घुमा रहा है।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२॥
हे भारत! तू सब प्रकार से उस एक परमेश्वर की ही शरण में जा। उसकी कृपा से तू परम शान्ति और शाश्वत स्थान को प्राप्त होगा।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३॥
इस प्रकार मैंने तुझसे इस ज्ञान को कहा जो रहस्यों में भी अति रहस्य है। इसका सम्पूर्ण विचार करके, जैसा तू चाहे वैसा कर।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४॥
सबसे अति गोपनीय मेरे इस परम वचन को फिर से सुन। तू मुझे अत्यन्त प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हित के लिए कहूँगा।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥६५॥
मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझको नमस्कार कर। इस प्रकार तू मुझको ही प्राप्त होगा। मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥
सब धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत कर।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७॥
यह (ज्ञान) तपस्वी को छोड़कर, अभक्त को, अशुश्रूषु (सेवा न करने वाले) को और मुझसे द्वेष करने वाले को कभी नहीं कहना चाहिए।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८॥
जो इस परम गोपनीय ज्ञान को मेरे भक्तों में कहेगा, तथा मुझमें परम भक्ति करेगा, वह निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९॥
उससे बढ़कर मनुष्यों में मेरा प्रिय कार्य करने वाला दूसरा नहीं है और न ही पृथ्वी पर उससे अधिक मुझे प्रिय दूसरा कोई होगा।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७०॥
तथा जो हम दोनों के इस धर्मयुक्त संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा – ऐसा मेरा मत है।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥७१॥
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और द्वेष रहित होकर इस (गीता) को सुनेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यात्माओं के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२॥
हे पार्थ! क्या यह (गीता) तूने एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?
अर्जुन उवाच नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३॥
अर्जुन बोले: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गई। मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ; आपके वचन का पालन करूँगा।
सञ्जय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४॥
सञ्जय बोले: इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमांचक संवाद को सुना।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥७५॥
व्यास की कृपा से मैंने इस परम गोपनीय योग को साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से, जो स्वयं कह रहे थे, सुना।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।