मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥२६॥
जो कर्ता आसक्ति रहित, अहंकार रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सफलता-असफलता में निर्विकार है – वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १८ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का आदेश देते हैं। यह अध्याय मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १८ (मोक्ष संन्यास योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का आदेश देते हैं। यह अध्याय मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / ४)
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥२६॥
जो कर्ता आसक्ति रहित, अहंकार रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सफलता-असफलता में निर्विकार है – वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७॥
जो कर्ता रागी है, कर्मफल की इच्छा रखता है, लोभी है, हिंसक प्रवृत्ति का है, अशुचि है, तथा हर्ष-शोक से युक्त है – वह राजस कर्ता कहा गया है।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८॥
जो कर्ता अयुक्त (असंयमी), प्राकृत (असभ्य), स्तब्ध (घमण्डी), शठ (ठग), नैष्कृतिक (दूसरों का अपमान करने वाला), आलसी, विषादी (उदास रहने वाला) और दीर्घसूत्री (टालमटोल करने वाला) है – वह तामस कर्ता कहलाता है।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९॥
हे धनञ्जय! बुद्धि और धृति के भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार के भेद को सम्पूर्ण रूप से पृथक-पृथक सुनो।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३०॥
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति (कर्म करने) और निवृत्ति (कर्म त्यागने) को, कार्य-अकार्य को, भय-अभय को, तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है – वह बुद्धि सात्त्विकी है।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१॥
हे पार्थ! जो बुद्धि धर्म और अधर्म को तथा कार्य और अकार्य को यथार्थ रूप से नहीं जानती (विपरीत या अधूरा जानती है) – वह बुद्धि राजसी है।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२॥
हे पार्थ! जो बुद्धि तमस् से आच्छन्न होकर अधर्म को धर्म मानती है और सम्पूर्ण पदार्थों को विपरीत (उल्टा) देखती है – वह बुद्धि तामसी है।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३॥
हे पार्थ! जिस धृति (दृढ़ता) के द्वारा अव्यभिचारिणी योग (अटल एकाग्रता) से मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण किया जाता है – वह धृति सात्त्विकी है।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४॥
हे अर्जुन! किन्तु जिस धृति से मनुष्य आसक्तिपूर्वक फल की इच्छा रखते हुए धर्म, काम और अर्थ का आश्रय लेता है – वह धृति राजसी है।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५॥
हे पार्थ! जिस धृति के द्वारा दुर्मेधा (मन्दबुद्धि) मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद (घमण्ड) को नहीं छोड़ता – वह धृति तामसी है।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६॥
हे भरतश्रेष्ठ! अब तू मुझसे तीन प्रकार के सुख को सुन। जिस सुख का अभ्यास करने से मनुष्य रमण करता है और दुःख के अन्त को प्राप्त होता है।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७॥
जो सुख प्रारम्भ में विष के समान (कष्टदायक) और परिणाम में अमृत के समान (सुखद) है, तथा आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है – वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८॥
जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, जो प्रारम्भ में अमृत के समान (सुखद) और परिणाम में विष के समान (दुःखद) है – वह सुख राजस कहा गया है।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥३९॥
जो सुख आरम्भ में और अन्त में आत्मा को मोहित करने वाला है, तथा निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है – वह तामस सुख कहा गया है।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४०॥
पृथ्वी में अथवा स्वर्ग में, देवताओं में भी, ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१॥
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – इनके कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित हैं।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥४२॥
शम (मन का निग्रह), दम (इन्द्रियों का निग्रह), तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य – ये ब्राह्मण के स्वभावज कर्म हैं।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥४३॥
शौर्य (वीरता), तेज (प्रभाव), धृति (दृढ़ता), दाक्ष्य (कुशलता), युद्ध में न भागना, दान और ऐश्वर्यभाव – ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४॥
कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सेवा रूपी कर्म शूद्र के भी स्वाभाविक हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५॥
अपने-अपने कर्म में तत्पर हुआ मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। स्वकर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को पाता है, उसे सुन।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६॥
जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति हुई और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने कर्म द्वारा आराधना करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४७॥
अपना धर्म भले ही गुणहीन (त्रुटिपूर्ण) हो, पर दूसरे के धर्म से जो भलीभाँति किया गया हो, वह श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥४८॥
हे कौन्तेय! सहज (स्वाभाविक) कर्म यदि दोषयुक्त भी हो, तो उसे नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सम्पूर्ण आरम्भ (कर्म) दोष से उस प्रकार आवृत हैं जैसे धुएँ से अग्नि।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥४९॥
जिसकी बुद्धि सर्वत्र अनासक्त है, जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो इच्छा से रहित है – वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्य (कर्मों के अभाव) रूपी परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५०॥
हे कौन्तेय! सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे संक्षेप में मुझसे जान। ज्ञान की जो परा निष्ठा (परम अवस्था) है, उसे समझ।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।