वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६॥
हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों को, जो बीत चुके हैं, वर्तमान में हैं और भविष्य में होंगे, जानता हूँ। परन्तु मुझे कोई नहीं जानता।
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ७ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (साक्षात्कार) का वर्णन करते हैं। वह अपनी योगमाया, अपने दो प्रकार के स्वरूप (परा और अपरा प्रकृति) तथा भक्ति द्वारा उन्हें जानने के मार्ग की व्याख्या करते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ७ (ज्ञान विज्ञान योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (साक्षात्कार) का वर्णन करते हैं। वह अपनी योगमाया, अपने दो प्रकार के स्वरूप (परा और अपरा प्रकृति) तथा भक्ति द्वारा उन्हें जानने के मार्ग की व्याख्या करते हैं।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६॥
हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों को, जो बीत चुके हैं, वर्तमान में हैं और भविष्य में होंगे, जानता हूँ। परन्तु मुझे कोई नहीं जानता।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७॥
हे भरतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह के कारण समस्त प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८॥
परन्तु जिन पुण्यकर्मी मनुष्यों के पाप समाप्त हो गए हैं, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत से मेरा भजन करते हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९॥
जो पुरुष जरा और मरण से मुक्ति के लिए मेरी शरण ग्रहण करके प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और समस्त कर्म को जान लेते हैं।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३०॥
जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रूप में जानते हैं, वे युक्तचित्त होकर मृत्युकाल में भी मुझे जानते हैं (अर्थात् मुझे प्राप्त होते हैं)।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।