कर्म षटक (अध्याय १-६) अध्याय २ · कुल ७२ श्लोक 3 मिनट अध्ययन

सांख्य योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय २ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह का निवारण करते हुए सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग का उपदेश देते हैं। यह अध्याय गीता का सार माना जाता है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
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पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय २ (सांख्य योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह का निवारण करते हुए सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग का उपदेश देते हैं। यह अध्याय गीता का सार माना जाता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / ३)

श्लोक २६ - ५०
अध्याय २ · श्लोक २६

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ||२६||

हिंदी अर्थ

और यदि तू इस (शरीर) को बार-बार जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानता है, तब भी हे महाबाहो! तुझे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

अध्याय २ · श्लोक २७

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||२७||

हिंदी अर्थ

जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य (अवश्यम्भावी) विषय में तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

अध्याय २ · श्लोक २८

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत | अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ||२८||

हिंदी अर्थ

हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त थे, मध्य में (जीवन में) व्यक्त हैं, और मरने के बाद पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। फिर ऐसी दशा में विलाप कैसा?

अध्याय २ · श्लोक २९

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः | आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ||२९||

हिंदी अर्थ

कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह वर्णन करता है, और कोई आश्चर्य की तरह सुनता है। परन्तु कोई सुनकर भी नहीं जानता।

अध्याय २ · श्लोक ३०

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ||३०||

हिंदी अर्थ

हे भारत! यह आत्मा सबके शरीर में स्थित है और सदा अवध्य (न मारा जा सकने वाला) है। इसलिए तू सभी प्राणियों के लिए शोक करने योग्य नहीं है।

अध्याय २ · श्लोक ३१

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि | धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||३१||

हिंदी अर्थ

अपने स्वधर्म को देखते हुए भी तुझे विकम्पित (डिगना) नहीं चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है।

अध्याय २ · श्लोक ३२

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् | सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ||३२||

हिंदी अर्थ

हे पार्थ! ऐसा युद्ध जो बिना माँगे ही प्राप्त हुआ है और स्वर्ग का खुला द्वार है, उसे पाकर क्षत्रिय सौभाग्यशाली होते हैं।

अध्याय २ · श्लोक ३३

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि | ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||३३||

हिंदी अर्थ

यदि तू इस धर्मयुद्ध को नहीं करेगा, तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा।

अध्याय २ · श्लोक ३४

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् | सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ||३४||

हिंदी अर्थ

तथा सब लोग तेरा अमिट अपयश कहेंगे, और सम्मानित पुरुष के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है।

अध्याय २ · श्लोक ३५

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः | येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ||३५||

हिंदी अर्थ

बड़े-बड़े योद्धा तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे, और जिनके द्वारा तू बहुत सम्मानित था, उनके पास तू तुच्छ (हल्का) हो जाएगा।

अध्याय २ · श्लोक ३६

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः | निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ||३६||

हिंदी अर्थ

तेरे शत्रु तेरी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथ्य वचन कहेंगे। उससे बढ़कर दुःखदायी और क्या होगा?

अध्याय २ · श्लोक ३७

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् | तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ||३७||

हिंदी अर्थ

मारे जाने पर तू स्वर्ग को प्राप्त करेगा और जीतने पर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! निश्चय करके युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

अध्याय २ · श्लोक ३८

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ | ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ||३८||

हिंदी अर्थ

सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर तू युद्ध के लिए तैयार हो। इस प्रकार (युद्ध करने से) तू पाप को प्राप्त नहीं होगा।

अध्याय २ · श्लोक ३९

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु | बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ||३९||

हिंदी अर्थ

तेरे लिए यह सांख्ययोग की बुद्धि कही गई। अब कर्मयोग की बुद्धि सुन, जिससे युक्त होकर तू कर्मों के बन्धन को त्याग देगा।

अध्याय २ · श्लोक ४०

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||४०||

हिंदी अर्थ

इस (कर्मयोग) में आरम्भ का नाश नहीं होता और उल्टा फल (प्रत्यवाय) भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास बड़े भय से रक्षा करता है।

अध्याय २ · श्लोक ४१

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन | बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ||४१||

हिंदी अर्थ

हे कुरुनन्दन! इस (कर्मयोग) में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी (अनिश्चित) पुरुषों की बुद्धियाँ बहुत शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं।

अध्याय २ · श्लोक ४२

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः | वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ||४२||

हिंदी अर्थ

हे पार्थ! जो अविवेकी पुरुष वेदों के वाक्यों में आसक्त रहते हैं और 'इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं' ऐसा वाद करते हैं, वे इस पुष्पित (सुन्दर) वाणी को बोलते हैं।

अध्याय २ · श्लोक ४३

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् | क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ||४३||

हिंदी अर्थ

जो कामनाओं से युक्त हैं, स्वर्ग को परम मानते हैं, और भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार की क्रियाओं में लगे रहते हैं – वे जन्म और कर्मफल देने वाली (गति को प्राप्त होते हैं)।

अध्याय २ · श्लोक ४४

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||४४||

हिंदी अर्थ

भोग और ऐश्वर्य में आसक्त और उस (पुष्पित वाणी) से चित्त हरे हुए पुरुषों की निश्चयात्मिका बुद्धि समाधि में नहीं लगती।

अध्याय २ · श्लोक ४५

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||४५||

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों के विषय में बताते हैं। तू तीनों गुणों से रहित, द्वन्द्वों से रहित, नित्य सत्त्वगुण में स्थित, योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा) की चिन्ता से रहित और आत्मनिष्ठ हो।

अध्याय २ · श्लोक ४६

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ||४६||

हिंदी अर्थ

जैसे सब ओर से जल से भरे हुए जलाशय में कुएँ का थोड़ा-सा जल जितना उपयोगी होता है, उतना ही जानने वाले ब्राह्मण (आत्मज्ञानी) के लिए सब वेद उपयोगी होते हैं।

अध्याय २ · श्लोक ४७

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||४७||

हिंदी अर्थ

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत हो, और तेरी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी आसक्ति न हो।

अध्याय २ · श्लोक ४८

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||४८||

हिंदी अर्थ

हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि-असिद्धि में समान होकर, योग में स्थिर होकर कर्म कर। समत्व ही योग कहलाता है।

अध्याय २ · श्लोक ४९

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय | बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ||४९||

हिंदी अर्थ

हे धनञ्जय! बुद्धियोग (समबुद्धि) से कर्म करना साधारण कर्म से बहुत श्रेष्ठ है। इसलिए तू बुद्धि में शरण चाह। फल की इच्छा रखने वाले तो कृपण (दीन) हैं।

अध्याय २ · श्लोक ५०

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||५०||

हिंदी अर्थ

समबुद्धि से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए तू योग के लिए तत्पर हो। योग कर्मों में कुशलता (चातुर्य) है।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
सांख्य योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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