ज्ञान षटक (अध्याय १३-१८) अध्याय १३ · कुल ३५ श्लोक 5 मिनट अध्ययन

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १३ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के ज्ञान का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि आत्मा अविनाशी, निर्लिप्त और साक्षी है, और उसे जानना ही सच्चा ज्ञान है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १३ (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के ज्ञान का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि आत्मा अविनाशी, निर्लिप्त और साक्षी है, और उसे जानना ही सच्चा ज्ञान है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)

श्लोक २६ - ३५
अध्याय १३ · श्लोक २६

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते | तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः || २६ ||

हिंदी अर्थ

किन्तु अन्य लोग, जो इस प्रकार नहीं जानते, दूसरों से सुनकर ही उपासना करते हैं। वे भी श्रवण में तत्पर होकर मृत्यु से पार हो जाते हैं।

अध्याय १३ · श्लोक २७

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् | क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || २७ ||

हिंदी अर्थ

हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही जानो।

अध्याय १३ · श्लोक २८

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् | विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति || २८ ||

हिंदी अर्थ

जो सब प्राणियों में समान रूप से स्थित, अविनाशी परमेश्वर को विनश्वर प्राणियों के बीच देखता है, वही यथार्थ देखता है।

अध्याय १३ · श्लोक २९

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् | न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् || २९ ||

हिंदी अर्थ

क्योंकि वह सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, इसलिए वह अपने द्वारा अपनी आत्मा की हिंसा नहीं करता (अर्थात् आत्मा को शरीर समझकर उसका अहित नहीं करता) और तब परमगति को प्राप्त होता है।

अध्याय १३ · श्लोक ३०

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः | यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति || ३० ||

हिंदी अर्थ

जो यह देखता है कि सम्पूर्ण कर्म प्रकृति द्वारा ही किये जा रहे हैं और आत्मा अकर्ता है, वही यथार्थ देखता है।

अध्याय १३ · श्लोक ३१

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || ३१ ||

हिंदी अर्थ

जब मनुष्य यह देख लेता है कि सम्पूर्ण प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

अध्याय १३ · श्लोक ३२

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः | शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || ३२ ||

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि होने के कारण और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।

अध्याय १३ · श्लोक ३३

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते | सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते || ३३ ||

हिंदी अर्थ

जैसे सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म होने के कारण कहीं भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में सर्वत्र स्थित आत्मा (परमात्मा) कहीं लिप्त नहीं होता।

अध्याय १३ · श्लोक ३४

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३४॥

हिंदी अर्थ

हे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्रज्ञ (पुरुष) सम्पूर्ण क्षेत्र (शरीर) को प्रकाशित करता है।

अध्याय १३ · श्लोक ३५

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३५॥

हिंदी अर्थ

जो लोग इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के अन्तर को तथा भूतप्रकृति (प्रकृति) से मोक्ष को ज्ञानचक्षु द्वारा जान लेते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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