कर्म षटक (अध्याय १-६) अध्याय १ · कुल ४७ श्लोक 4 मिनट अध्ययन

अर्जुन विषाद योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

प्रथम अध्याय में कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि का वर्णन है और अर्जुन के गहरे विषाद का चित्रण है, जो आगे के उपदेशों की भूमिका तैयार करता है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १ (अर्जुन विषाद योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

प्रथम अध्याय में कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि का वर्णन है और अर्जुन के गहरे विषाद का चित्रण है, जो आगे के उपदेशों की भूमिका तैयार करता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)

श्लोक २६ - ४७
अध्याय १ · श्लोक २६

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् | आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||२६||

हिंदी अर्थ

वहाँ अर्जुन ने देखा कि दोनों सेनाओं में उनके पिता, पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र आदि सभी खड़े थे।

अध्याय १ · श्लोक २७

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि | तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ||२७||

हिंदी अर्थ

दोनों सेनाओं में ससुर और हितैषी भी थे। उन सब बांधवों को वहाँ खड़ा देखकर अर्जुन के हृदय में करुणा उत्पन्न हुई।

अध्याय १ · श्लोक २८

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् | दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ||२८||

हिंदी अर्थ

अत्यधिक करुणा से आविष्ट और विषाद करते हुए अर्जुन ने यह कहा: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से उपस्थित अपने इन स्वजनों को देखकर ...

अध्याय १ · श्लोक २९

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति | वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ||२९||

हिंदी अर्थ

मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर में कम्पन हो रहा है और रोमांच खड़ा हो रहा है।

अध्याय १ · श्लोक ३०

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||३०||

हिंदी अर्थ

मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है, मैं स्थिर खड़ा नहीं रह सकता और मेरा मन घूम रहा है (भ्रमित हो रहा है)।

अध्याय १ · श्लोक ३१

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव | न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ||३१||

हिंदी अर्थ

हे केशव! मैं विपरीत (अशुभ) लक्षण देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर मुझे कल्याण नहीं दिखता।

अध्याय १ · श्लोक ३२

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च | किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||३२||

हिंदी अर्थ

हे कृष्ण! मैं विजय नहीं चाहता, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या प्रयोजन? भोगों से या जीवन से भी क्या?

अध्याय १ · श्लोक ३३

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च | त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||३३||

हिंदी अर्थ

जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते थे, वे ही लोग यहाँ प्राण और धन त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।

अध्याय १ · श्लोक ३४

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः | मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ||३४||

हिंदी अर्थ

आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य संबंधी – ये सभी यहाँ हैं।

अध्याय १ · श्लोक ३५

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन | अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ||३५||

हिंदी अर्थ

हे मधुसूदन! मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, चाहे ये मुझे ही क्यों न मारें, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, तो फिर पृथ्वी के लिए तो क्या कहना?

अध्याय १ · श्लोक ३६

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ||३६||

हिंदी अर्थ

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने पर भी हमें पाप ही लगेगा।

अध्याय १ · श्लोक ३७

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् | स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ||३७||

हिंदी अर्थ

अतएव हे माधव! हम अपने बांधव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के योग्य नहीं हैं। अपने स्वजनों को मारकर हम सुखी कैसे हो सकते हैं?

अध्याय १ · श्लोक ३८

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः | कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ||३८||

हिंदी अर्थ

यद्यपि लोभ से ग्रस्त चित्त वाले ये (धृतराष्ट्र के पुत्र) कुल के विनाश से होने वाले दोष को और मित्रों से द्रोह रूपी पातक को नहीं देखते, ...

अध्याय १ · श्लोक ३९

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् | कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||३९||

हिंदी अर्थ

हे जनार्दन! जो लोग कुलक्षय से उत्पन्न दोष को देख रहे हैं, उन्हें इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं जानना चाहिए?

अध्याय १ · श्लोक ४०

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||४०||

हिंदी अर्थ

कुल के नाश होने पर सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल में अधर्म प्रबल हो जाता है।

अध्याय १ · श्लोक ४१

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः | स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ||४१||

हिंदी अर्थ

हे कृष्ण! अधर्म के प्रबल होने पर कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं। हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के भ्रष्ट होने पर वर्णसंकर (अवांछित संतान) उत्पन्न होती है।

अध्याय १ · श्लोक ४२

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च | पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ||४२||

हिंदी अर्थ

वर्णसंकर कुलघातियों और कुल को नरक में ले जाने वाला होता है। ऐसे कुलों के पितर पिण्डदान और जलांजलि से वंचित होकर अधोगति को प्राप्त होते हैं।

अध्याय १ · श्लोक ४३

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः | उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ||४३||

हिंदी अर्थ

कुलघातियों के इन दोषों (वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले) से जाति के धर्म और सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं।

अध्याय १ · श्लोक ४४

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन | नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ||४४||

हिंदी अर्थ

हे जनार्दन! हमने सुना है कि जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन मनुष्यों का नरक में अनिश्चित काल तक वास होता है।

अध्याय १ · श्लोक ४५

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ||४५||

हिंदी अर्थ

हाय! कितने आश्चर्य की बात है कि हम राज्य के सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने के लिए उद्यत होकर बड़ा पाप करने को तत्पर हैं।

अध्याय १ · श्लोक ४६

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः | धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ||४६||

हिंदी अर्थ

यदि धृतराष्ट्र के पुत्र हाथ में शस्त्र लिए युद्ध में मुझे बिना प्रतिकार किए और शस्त्र रहित मार डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।

अध्याय १ · श्लोक ४७

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् | विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ||४७||

हिंदी अर्थ

युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर अर्जुन ने बाणों सहित धनुष त्याग दिया और शोक से व्याकुल मन से रथ के पिछले भाग में बैठ गए।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
अर्जुन विषाद योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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