कर्म षटक (अध्याय १-६) अध्याय ४ · कुल ४२ श्लोक 4 मिनट अध्ययन

ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ४ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

चौथा अध्याय: ज्ञान-कर्म-संन्यास योग। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ज्ञानयोग और कर्मयोग के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। वे अपने दिव्य जन्म और कर्मों का वर्णन करते हैं, तथा बताते हैं कि कैसे ज्ञान की अग्नि में समस्त कर्मों को भस्म किया जा सकता है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ४ (ज्ञान कर्म संन्यास योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

चौथा अध्याय: ज्ञान-कर्म-संन्यास योग। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ज्ञानयोग और कर्मयोग के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। वे अपने दिव्य जन्म और कर्मों का वर्णन करते हैं, तथा बताते हैं कि कैसे ज्ञान की अग्नि में समस्त कर्मों को भस्म किया जा सकता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)

श्लोक २६ - ४२
अध्याय ४ · श्लोक २६

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति | शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||२६||

हिंदी अर्थ

कितने ही (योगी) श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य (योगी) शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन करते हैं।

अध्याय ४ · श्लोक २७

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे | आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ||२७||

हिंदी अर्थ

अन्य (योगी) सब इन्द्रियों के कर्मों और प्राणों के कर्मों को, ज्ञान से प्रदीप्त आत्म-संयमरूपी योग की अग्नि में हवन करते हैं।

अध्याय ४ · श्लोक २८

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे | स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ||२८||

हिंदी अर्थ

कितने ही द्रव्य-यज्ञ, तपो-यज्ञ, योग-यज्ञ करते हैं, और अन्य संयमी, दृढ़ व्रत वाले साधक स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ करते हैं।

अध्याय ४ · श्लोक २९

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे | प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः | अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ||२९||

हिंदी अर्थ

कितने ही (योगी) अपान में प्राण को हवन करते हैं और प्राण में अपान को हवन करते हैं। प्राण और अपान की गति को रोककर, प्राणायाम में तत्पर रहने वाले अन्य योगी हैं। अन्य नियमित आहार वाले योगी प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं।

अध्याय ४ · श्लोक ३०

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः | यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ||३०||

हिंदी अर्थ

ये सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले हैं, और यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले हैं – वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

अध्याय ४ · श्लोक ३१

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥

हिंदी अर्थ

यज्ञ से बचे हुए अमृत (प्रसाद) को भोगने वाले योगीजन सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ न करने वाले के लिए तो यह (मनुष्य) लोक भी सुखद नहीं है, फिर परलोक (सुखद) कैसे हो सकता है?

अध्याय ४ · श्लोक ३२

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥

हिंदी अर्थ

इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों के मुख (द्वारा) विस्तृत रूप से कहे गए हैं। उन सबको कर्मों से उत्पन्न जानो और इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

अध्याय ४ · श्लोक ३३

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥

हिंदी अर्थ

हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में ही परिसमाप्त (चरम सीमा को प्राप्त) होते हैं।

अध्याय ४ · श्लोक ३४

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥

हिंदी अर्थ

उस (ज्ञान) को तू प्रणिपात (समर्पण), परिप्रश्न (विनीत प्रश्न) और सेवा द्वारा जान। तत्त्व के साक्षात्कारी ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश देंगे।

अध्याय ४ · श्लोक ३५

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥

हिंदी अर्थ

हे पाण्डव! जिस (ज्ञान) को जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिसके द्वारा तू सम्पूर्ण प्राणियों को अपने आप में और मुझमें देखेगा।

अध्याय ४ · श्लोक ३६

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥

हिंदी अर्थ

यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा तू सम्पूर्ण पाप-समुद्र को पार कर जाएगा।

अध्याय ४ · श्लोक ३७

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है।

अध्याय ४ · श्लोक ३८

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥

हिंदी अर्थ

निश्चय ही इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला और कुछ नहीं है। योग में सिद्ध पुरुष उस (ज्ञान) को समय के साथ अपने आप में पा लेता है।

अध्याय ४ · श्लोक ३९

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥

हिंदी अर्थ

श्रद्धालु, उसमें (ज्ञान में) तत्पर और संयमित इन्द्रियों वाला पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

अध्याय ४ · श्लोक ४०

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥

हिंदी अर्थ

अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशयी पुरुष नष्ट हो जाता है। संशयी पुरुष के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।

अध्याय ४ · श्लोक ४१

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥

हिंदी अर्थ

हे धनञ्जय! योग (समत्व) द्वारा कर्मों का त्याग किए हुए, ज्ञान द्वारा जिसके संशय नष्ट हो गए हैं, और जो आत्मनिष्ठ है—ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।

अध्याय ४ · श्लोक ४२

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥

हिंदी अर्थ

इसलिए हे भारत! तू अज्ञान से उत्पन्न, हृदय में स्थित इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल। योग (समत्वबुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
ज्ञान कर्म संन्यास योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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