कर्म षटक (अध्याय १-६) अध्याय ३ · कुल ४३ श्लोक 4 मिनट अध्ययन

कर्म योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ३ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

तीसरा अध्याय कर्म योग के सिद्धान्त की व्याख्या करता है – निष्काम कर्म, स्वधर्म का पालन, और ज्ञानी व कर्मयोगी की तुलना। Chapter 3 explains the doctrine of Karma Yoga – selfless action, performing one's duty, and the contrast between the wise and the active yogi.

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ३ (कर्म योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

तीसरा अध्याय कर्म योग के सिद्धान्त की व्याख्या करता है – निष्काम कर्म, स्वधर्म का पालन, और ज्ञानी व कर्मयोगी की तुलना। Chapter 3 explains the doctrine of Karma Yoga – selfless action, performing one's duty, and the contrast between the wise and the active yogi.

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)

श्लोक २६ - ४३
अध्याय ३ · श्लोक २६

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् | जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ||२६||

हिंदी अर्थ

ज्ञानी पुरुष को कर्मासक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भेद (विक्षेप) नहीं डालना चाहिए, बल्कि स्वयं युक्त होकर सब कर्मों का आचरण करता हुआ उन्हें भी कर्मों में लगाए रखना चाहिए।

अध्याय ३ · श्लोक २७

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः | अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ||२७||

हिंदी अर्थ

सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं। फिर भी अहंकार से मोहित जीव "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मानता है।

अध्याय ३ · श्लोक २८

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः | गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||२८||

हिंदी अर्थ

परन्तु हे महाबाहो! गुणों और कर्मों के विभाग के तत्त्व को जानने वाला यह समझकर कि "गुण गुणों में बरत रहे हैं", आसक्त नहीं होता।

अध्याय ३ · श्लोक २९

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु | तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ||२९||

हिंदी अर्थ

प्रकृति के गुणों से मोहित हुए लोग गुणों और कर्मों में आसक्त हो जाते हैं। उन अल्पज्ञ, मन्दबुद्धि लोगों को सम्पूर्ण ज्ञानी को विचलित नहीं करना चाहिए।

अध्याय ३ · श्लोक ३०

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा | निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ||३०||

हिंदी अर्थ

मुझमें सब कर्मों का समर्पण करके, अध्यात्म-बुद्धि से युक्त हो, आशा-आकांक्षा रहित, ममता रहित और शोकरहित होकर युद्ध कर।

अध्याय ३ · श्लोक ३१

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः | श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ||३१||

हिंदी अर्थ

जो मनुष्य इस मेरे मत (उपदेश) का श्रद्धापूर्वक और बिना दोषदृष्टि के नित्य पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

अध्याय ३ · श्लोक ३२

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् | सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ||३२||

हिंदी अर्थ

परन्तु जो लोग इस मेरे मत (उपदेश) में दोष निकालते हुए इसका पालन नहीं करते, उन सब ज्ञानों से रहित, नष्ट और अचेत (विवेकहीन) जानो।

अध्याय ३ · श्लोक ३३

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि | प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ||३३||

हिंदी अर्थ

ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुरूप ही आचरण करता है। सब प्राणी प्रकृति के वश में हैं, बलपूर्वक दमन (रोकना) क्या करेगा?

अध्याय ३ · श्लोक ३४

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ | तयोर्न वशमागच्छेतौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ||३४||

हिंदी अर्थ

प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग (आसक्ति) और द्वेष स्थित हैं। उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे इस (साधक) के शत्रु हैं।

अध्याय ३ · श्लोक ३५

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ||३५||

हिंदी अर्थ

अपना धर्म (कर्तव्य) यदि गुणहीन (त्रुटिपूर्ण) हो, तो भी दूसरे के सुनिष्ठित धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भयावह होता है।

अध्याय ३ · श्लोक ३६

अर्जुन उवाच | अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः | अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ||३६||

हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे वार्ष्णेय! फिर किसके द्वारा प्रेरित होकर यह मनुष्य पाप करता है, अनिच्छा से भी, मानो बलपूर्वक लगाया गया हो?

अध्याय ३ · श्लोक ३७

श्रीभगवानुवाच | काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः | महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ||३७||

हिंदी अर्थ

श्रीभगवान् बोले: यह काम और यह क्रोध, जो रजोगुण से उत्पन्न हैं, महान भक्षक (अतृप्त) और महापापी हैं। इसे ही इस (संसार) में शत्रु जान।

अध्याय ३ · श्लोक ३८

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च | यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ||३८||

हिंदी अर्थ

जैसे धुएँ से अग्नि ढकी रहती है, जैसे दर्पण मैल से ढका रहता है, जैसे गर्भ झिल्ली से ढका रहता है, वैसे ही इस (जगत) को उस (काम) ने ढक रखा है।

अध्याय ३ · श्लोक ३९

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा | कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ||३९||

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! ज्ञानी के इस नित्य शत्रु ने, जो काम के रूप में है और अग्नि के समान कभी न बुझने वाला है, ज्ञान को ढक रखा है।

अध्याय ३ · श्लोक ४०

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते | एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ||४०||

हिंदी अर्थ

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – ये इस (काम) के स्थान (आधार) कहे जाते हैं। इनके द्वारा यह (काम) ज्ञान को ढककर शरीरधारी (जीव) को मोहित करता है।

अध्याय ३ · श्लोक ४१

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ | पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ||४१||

हिंदी अर्थ

इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! पहले इन्द्रियों को वश में करके, इस ज्ञान-विज्ञान का नाश करने वाले पापी (काम) को नष्ट कर डाल।

अध्याय ३ · श्लोक ४२

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः | मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ||४२||

हिंदी अर्थ

इन्द्रियाँ (शरीर से) श्रेष्ठ कही जाती हैं, इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, और जो बुद्धि से परे है – वह (आत्मा) है।

अध्याय ३ · श्लोक ४३

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना | जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ||४३||

हिंदी अर्थ

इस प्रकार बुद्धि से परे (आत्मा) को जानकर, बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, हे महाबाहो! इस दुर्जय कामरूपी शत्रु को मार डाल।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
कर्म योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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