कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः | जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||५१||
समबुद्धि से युक्त बुद्धिमान पुरुष कर्मजन्य फल को त्यागकर जन्म-बन्धन से मुक्त होकर उस रोगरहित (निर्विकार) पद को प्राप्त होते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय २ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह का निवारण करते हुए सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग का उपदेश देते हैं। यह अध्याय गीता का सार माना जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय २ (सांख्य योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह का निवारण करते हुए सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग का उपदेश देते हैं। यह अध्याय गीता का सार माना जाता है।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ ३ / ३)
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः | जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||५१||
समबुद्धि से युक्त बुद्धिमान पुरुष कर्मजन्य फल को त्यागकर जन्म-बन्धन से मुक्त होकर उस रोगरहित (निर्विकार) पद को प्राप्त होते हैं।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति | तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||५२||
जब तेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़ को पार कर जाएगी, तब तू श्रोतव्य (सुनने योग्य) और श्रुत (सुने हुए) के प्रति वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||५३||
जब वेदों के विभिन्न प्रवचनों से भ्रमित तेरी बुद्धि समाधि में अचल होकर स्थित हो जाएगी, तब तू योग को प्राप्त कर लेगा।
अर्जुन उवाच | स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव | स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ||५४||
अर्जुन बोले: हे केशव! समाधि में स्थित स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि) पुरुष की क्या पहचान है? वह स्थिरबुद्धि कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है?
श्रीभगवानुवाच | प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् | आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||५५||
श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ! जब पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को पूर्णतः त्याग देता है और आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः | वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||५६||
दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा (इच्छा) नहीं रहती, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है, वह स्थिर बुद्धि मुनि कहा जाता है।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् | नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५७||
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित (बिना आसक्ति) है और इस प्रकार शुभ या अशुभ को प्राप्त होकर न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५८||
जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह (पुरुष) इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः | रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||५९||
भोगों का त्याग करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर उनका रस (आस्वाद) निवृत्त नहीं होता। किन्तु परम (ब्रह्म) को देख लेने पर उसका रस भी निवृत्त हो जाता है।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ||६०||
हे कौन्तेय! प्रयत्न करते हुए भी बुद्धिमान पुरुष के प्रबल (चंचल) इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को हर लेती हैं।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६१||
उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर बैठे (स्थित हो)। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते | सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ||६२||
विषयों का चिन्तन करते हुए पुरुष की उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः | स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||६३||
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति-भ्रम होता है, स्मृति-भ्रम से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि-नाश से मनुष्य नष्ट (पतित) हो जाता है।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||
परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ (व्यवहार करता हुआ) वश में किए हुए अन्तःकरण वाला होता है, वह प्रसाद (शान्ति) को प्राप्त होता है।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||६५||
उस प्रसाद (शान्ति) के प्राप्त होने पर इसके (साधक के) सब दुःखों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||६६||
अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान) होती है, और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ?
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते | तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||६७||
जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६८||
इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से सब प्रकार से रोक ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी | यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ||६९||
समस्त प्राणियों के लिए जो रात्रि (अज्ञान) है, उसमें संयमी पुरुष जागता है। जिस (विषय-भोग) में सब प्राणी जागते हैं, वह आत्मदर्शी मुनि के लिए रात्रि (अज्ञान) है।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् | तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||७०||
जैसे नदियाँ भरते हुए भी अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही जिस (स्थितप्रज्ञ) में सब कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति को प्राप्त होता है, न कि कामनाओं का चाहने वाला (कामी)।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः | निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ||७१||
जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह (इच्छारहित), निर्मम (ममतारहित) और निरहङ्कार (अहंकाररहित) होकर आचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति | स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ||७२||
हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म में स्थिति) है। इसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। इस स्थिति में स्थित होकर अन्तकाल में भी वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।